डॉ. राजेंद्र कुकसाल से जानिए, पर्वतीय फल शोध केंद्र चौबटिया का स्वर्णिम इतिहास

Rajendra Kuksal
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डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 06 फरवरी, 2026ः पर्वतीय फल शोध केंद्र (Hill Fruit Research Station), जिसे वर्तमान में औद्यानिक प्रशिक्षण एवं परीक्षण केंद्र के नाम से जाना जाता है, की स्थापना ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1932 में की गई। इसका उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में फल उत्पादन से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान का विकास एवं प्रसार करना था, जिसमें पौधों का रोपण, प्रसारण, मृदा विज्ञान, खाद एवं सिंचाई प्रबंधन, कटाई-छंटाई, कीट एवं रोग नियंत्रण आदि प्रमुख विषय सम्मिलित थे। यह केंद्र चौबटिया, (रानीखेत) जनपद अल्मोड़ा में स्थापित किया गया।

प्रारंभिक वर्षों में इस शोध केंद्र के अंतर्गत उद्यान, भू-रसायन, कीट विज्ञान एवं पादप रोग विज्ञान अनुभाग स्थापित किए गए। यहां बागवानी विशेषज्ञों की एक सशक्त टीम कार्यरत रही, जिसमें आर. एस. सिंह (हॉर्टिकल्चरिस्ट), एन. के. दास (सॉइल केमिस्ट), यू. बी. सिंह (मायकोलॉजिस्ट) तथा आर. एन. सिंह (एंटोमोलॉजिस्ट) प्रमुख थे। बाद के वर्षों में,पौध दैहिकी (Plant Physiology), पादप अभिजनन (Plant Breeding), भेषज, मशरूम तथा कला एवं प्रचार-प्रसार जैसे अतिरिक्त अनुभाग स्थापित किए गए।

भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के विकास का सपना देखा और उसे मूर्त रूप देने के लिए वर्ष 1953 में माल रोड, रानीखेत (अल्मोड़ा) में किराए के भवनों में उद्यान निदेशालय एवं फल उपयोग विभाग, उत्तर प्रदेश की स्थापना की। यह उत्तर प्रदेश सरकार का एकमात्र निदेशालय था, जिसका मुख्यालय पर्वतीय क्षेत्र रानीखेत में स्थित था। डॉ. विक्टर साने इसके प्रथम निदेशक बने। लंबे समय तक संपूर्ण उत्तर प्रदेश का उद्यान निदेशालय रानीखेत में ही कार्यरत रहा।

वर्ष 1972 में चौबटिया फल शोध केंद्र के अधीन विभिन्न उप अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की गई, जिनमें पौड़ी गढ़वाल (श्रीनगर, कोटद्वार), चमोली (कोटियाल सैंण), टिहरी (सिमलासू), उत्तरकाशी (डुंडा), देहरादून (ढकरानी, चकरौता), नैनीताल (ज्योलिकोट, रुद्रपुर), अल्मोड़ा (मटेला) तथा पिथौरागढ़ (गैना-अंचुली) शामिल हैं। इन केंद्रों पर शीतोष्ण एवं समशीतोष्ण फलों, सब्जियों एवं मसाला फसलों से संबंधित किसानों की समस्याओं के समाधान हेतु शोध कार्य किए गए।

वर्ष 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निदेशालय भवन को चौबटिया में स्थापित करने का निर्णय लिया गया तथा वर्ष 1992 में यह भवन पूर्ण रूप से तैयार हुआ। वर्ष 1990 में निदेशालय का नाम परिवर्तित कर “उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उत्तर प्रदेश” कर दिया गया।

राज्य गठन से पूर्व शोध केंद्र की स्थिति-

A.चौबटिया (रानीखेत) शोध केंद्र –

कार्यरत प्रमुख अनुभाग थेः

  • उद्यान Horticulture
  • प्लांट ब्रीडिंग Plant Breeding
  • भू-रसायन Soil Chemistry
  • पादप रोग विज्ञान (Plant Pathology)
  • कीट विज्ञान (Entomology)
  • प्लांट फिजियोलॉजी
  • भेषज (Medicinal Plants)
  • मशरूम
  • कला एवं प्रचार-प्रसार

यहां एक मौसम विज्ञान वेधशाला (Meteorological Observatory) भी स्थापित की गई, जिसके माध्यम से पाला, ओलावृष्टि, आंधी-तूफान आदि मौसमीय परिवर्तनों का आंकलन किया जाता था।

विभिन्न अनुभागों का संचालन ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिकों द्वारा किया गया, जिनमें डा० सुनील कुमार बोस, डा० जितेंद्रनाथ सेठ, डा० आर. पी. श्रीवास्तव तथा डा० आर. के. पाठक प्रमुख रहे। इनके द्वारा किए गए शोध कार्यों का उल्लेख आज भी वैज्ञानिक जगत में किया जाता है। शोध केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा 500 से अधिक शोध पत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित किए गए। चौबटिया फल शोध केंद्र आगरा, कानपुर एवं कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. हेतु मान्यता प्राप्त केंद्र रहा है।

अब तक 25 से अधिक शोधार्थियों ने यहां शोध कर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। लेखक स्वयं भी वर्ष 1971 से 1979 तक इस शोध केंद्र में ज्येष्ठ शोध सहायक के रूप में कार्यरत रहे तथा यहीं कार्य करते हुए वर्ष 1979-80 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।यहां एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना की गई थी, जिसमें 12,000 से अधिक उच्चस्तरीय पुस्तकें एवं 15 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाएं नियमित रूप से उपलब्ध रहती थीं। चौबटिया शोध केंद्र से “Progressive Horticulture” नामक अंग्रेजी भाषा की त्रैमासिक पत्रिका भी नियमित रूप से प्रकाशित होती थी।

शोध केंद्र द्वारा हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, सिक्किम तथा पड़ोसी देशों भूटान, नेपाल एवं अफगानिस्तान को फल पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराई गई तथा वहां के प्रसार कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया।

केंद्र की प्रमुख उपलब्धियां-

  • चौबटिया पेस्ट, बागवानों की पहली पसंद एवं प्रभावी फफूंदनाशक।
  • सेब, नाशपाती, गुठलीदार एवं गिरीदार फलों के लिए उपयुक्त मूलवृंतों का चयन।
  • सेब की चौबटिया प्रिंसेज, सेब की चौबटिया अनुपम, खुबानी की चौबटिया मधु एवं चौबटिया अलंकार जैसी उन्नत किस्मों का विकास।
  • सभी पर्वतीय जनपदों का सर्वेक्षण कर मृदा परीक्षण एवं सॉयल मैप का निर्माण।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक डा० रतन सिंह चौहान ने भी चौबटिया शोध केंद्र को भारतीय उद्यान अनुसंधान का एक स्वर्णिम अध्याय बताया है और इसके संरक्षण एवं पुनर्जीवन की आवश्यकता पर बल दिया है।

चौबटिया शोध केंद्र की राज्य बनने के बाद की स्थिति-

वर्ष 2004 में चौबटिया सहित सभी शोध केंद्रों को गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर के अधीन कर दिया गया। पुनः वर्ष 2012–13 में इन शोध केंद्रों को उद्यान विभाग के अधीन वापस कर दिया गया। इस अवधि में अधिकांश वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अधिकारी सेवा- निवृत्त हो गए, किंतु उनके स्थान पर नए पदों का सृजन अथवा भराव नहीं किया गया परिणाम स्वरूप वैज्ञानिक पदों को सुनियोजित ढंग से समाप्त कर दिया गया और केंद्र की लगभग सभी गतिविधियाँ बंद होती चली गईं।

चौबटिया गार्डन, जो फल शोध केंद्र चौबटिया का प्रमुख प्रायोगिक प्रक्षेत्र था, में वर्षों की मेहनत से देश-विदेश एवं अन्य राज्यों से संकलित सेब, नाशपाती, आड़ू, प्लम, खुबानी, चेरी आदि की हजारों मूल्यवान किस्मों के फल वृक्षों को समूल काटकर नष्ट कर दिया गया। राज्य के नीति- निर्माताओं द्वारा इन बहुमूल्य एवं दुर्लभ फल प्रजातियों को कहीं भी संरक्षित अथवा सुरक्षित नहीं किया गया, जो एक अपूरणीय क्षति है।

B. प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र, श्रीनगर (गढ़वाल) –
इस केंद्र की स्थापना 1972–73 में उद्यान, भू-रसायन एवं मशरूम अनुभागों के साथ की गई। राजकीय पौधालय, श्रीनगर को इस शोध केंद्र का प्रायोगिक प्रक्षेत्र बनाया गया, जिसका उद्घाटन स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए वर्ष 1975 में किया।
वर्ष 1979 में इस केंद्र पर मुख्य उद्यान विशेषज्ञ का पद सृजित कर इसे मंडलीय शोध केंद्र का दर्जा दिया गया। डा० आर. एस. मिश्रा इस केंद्र के प्रथम मुख्य उद्यान विशेषज्ञ रहे। वर्ष 1992–93 में यहां प्लांट ब्रीडिंग, पादप रोग विज्ञान एवं कीट विज्ञान अनुभाग भी स्थापित किए गए।

प्रायोगिक प्रक्षेत्र में किन्नू संतरा एवं अन्य नींबू वर्गीय फलों, साथ ही अनार, आंवला एवं लो-चिलिंग आड़ू की विभिन्न किस्मों का रोपण किया गया। इन प्रयोगों के अत्यंत उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए। आड़ू, आंवला, संतरा एवं अनार की उन्नतशील किस्मों का चयन कर क्षेत्र में रोपण हेतु संस्तुति की गई।

केंद्र द्वारा स्थानीय कृषकों को उन्नतशील सब्जियों की पौध तथा फल पौध सामग्री उपलब्ध कराई जाती रही। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में नियमित रूप से मृदा परीक्षण किया गया तथा मशरूम उत्पादन हेतु स्पॉन तैयार कर उत्पादकों को वितरित किया जाता रहा।

राज्य गठन के बाद वर्तमान में इस केंद्र के सभी अनुभाग बंद पड़े हैं।

C. डुंडा, उत्तरकाशी –
इस शोध केंद्र पर बादाम, पिक्कनट एवं अखरोट की विभिन्न किस्में बाहर से लाकर रोपित की गईं तथा उन पर शोध कार्य किया गया। डा० मनमोहन सिन्हा, जो बाद में उत्तर प्रदेश में उद्यान निदेशक भी रहे, ने यहां कई वर्षों तक उद्यान विशेषज्ञ के रूप में सेवाएँ दीं। आज भी इस फार्म में उनके कार्यकाल में रोपित पिक्कनट की उन्नत किस्में फलत में हैं।

राज्य बनने के बाद इस केंद्र की सभी गतिविधियां बंद पड़ी हैं , बादाम के सभी पौधे समाप्त हो चुके हैं।

D. पिथौरागढ़ – गैना / अंचोली –
इस शोध केंद्र पर बादाम, पिक्कनट एवं अखरोट की विभिन्न किस्मों को बाहर से लाकर रोपण किया गया तथा उन पर अनुसंधान कार्य किए गए। डा० हीरालाल, जो राज्य बनने के बाद कुछ समय के लिए उद्यान निदेशक भी रहे, द्वारा यहां अखरोट पौधों के प्रसारण पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किया गया।

वर्तमान में इस केंद्र को कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) को हस्तांतरित कर दिया गया है।

अन्य सभी उप-शोध केंद्रों की स्थिति भी लगभग इसी प्रकार की है।

राज्य गठन के समय यह आशा जगी थी कि अपनी सरकारें पर्वतीय उद्यान विकास की उस आधारशिला को—जिसे हमारे पुरखों ने स्थापित किया था—आगे बढ़ाएँगी और बागवानों के हित में उसे सुदृढ़ करेंगी। किंतु आज यह ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक धरोहर उपेक्षा के कारण बंद होने के कगार पर खड़ी है।

 

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