डॉ. कुकसाल से जानिए, उत्तराखंड में सेब और आलू का इतिहास

जानिए उत्तराखंड में सेब और आलू की खेती का रोचक इतिहास। फ्रेडरिक विल्सन से लेकर चौबटिया गार्डन की स्थापना तक, डॉ. राजेंद्र कुकसाल का विशेष लेख।

Rajendra Kuksal
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डॉ. राजेंद्र कुकसाल, देहरादून, 15 फरवरी, 2026ः उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उत्पादित सेब, नाशपाती, आड़ू, प्लम, खुबानी, चेरी आदि फल यहां के परंपरागत फल नहीं हैं। इन फलों का परिचय (Introduction) तथा इन्हें वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय ब्रिटिश शासन को जाता है।

उत्तराखंड में सेब का इतिहास

वर्ष 1815 में अंग्रेजों द्वारा गोरखाओं को पराजित कर कुमाऊँ (वर्तमान कुमाऊँ एवं पौड़ी गढ़वाल) पर अधिकार किया गया। इसके पश्चात ही उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में शीतोष्ण फलों की बागवानी का आरंभ हुआ।

कुमाऊँ मंडल में सेब की बागवानी का प्रारंभ वर्ष 1855 में हुआ, जब सर हेनरी रैम्जे के प्रयासों से नैनीताल के रामगढ़ तथा अल्मोड़ा जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में सेब की खेती शुरू की गई।

गढ़वाल मंडल (टिहरी गढ़वाल) में वर्ष 1859 में फ्रेडरिक विल्सन—जो ब्रिटिश सेना का एक भगोड़ा सैनिक था—ने उत्तरकाशी जनपद के हर्षिल क्षेत्र में टिहरी नरेश से भूमि लीज पर लेकर इंग्लैंड/यूरोप से सेब के पौधे मंगवाए और सेब की बागवानी की नींव रखी। विल्सन ने स्थानीय जलवायु को समझते हुए यहाँ सफलतापूर्वक सेब के बगीचे स्थापित किए, जिससे क्षेत्र में कृषि एवं बागवानी के विकास को नई दिशा मिली। उस समय एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित हुई—
“सेब दो ही हुए—एक न्यूटन वाला, दूसरा विल्सन वाला।”

आज भी हर्षिल क्षेत्र में सेब की एक किस्म “विल्सन” के नाम से जानी जाती है।

उत्तराखंड में शीतोष्ण फलों की वैज्ञानिक एवं व्यवसायिक खेती की वास्तविक आधारशिला चौबटिया गार्डन (वर्तमान राजकीय उद्यान, चौबटिया) की स्थापना के साथ पड़ी। यह उद्यान रानीखेत (अल्मोड़ा) से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

चौबटिया गार्डन, जिसे उस समय कुमाऊँ गवर्नमेंट गार्डन कहा जाता था, की स्थापना वर्ष 1869 में की गई। डब्ल्यू. क्रो (W. Crow) इसके प्रथम सुपरिटेंडेंट नियुक्त किए गए। उनके कार्यकाल में यूरोप से सेब, नाशपाती, आड़ू, खुबानी, प्लम, चेरी तथा जापान एवं स्पेन से चेस्टनट (मीठा पांगर) के पौधों का रोपण कराया गया।

वर्ष 1914 में चौबटिया गार्डन को कुमाऊँ वन विभाग से हटाकर कुमाऊँ कमिश्नर के अधीन कर दिया गया। इसके अंतर्गत गवर्नमेंट हाउस गार्डन, कचहरी गार्डन, डिस्प्ले गार्डन (नैनीताल) तथा डगलस डेल हॉर्टिकल्चर गार्डन, ज्योलिकोट को भी सम्मिलित किया गया। इस अवधि में नार्मन गिल को कुमाऊँ गवर्नमेंट गार्डन का सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया गया। उन्होंने फल बागवानी के साथ-साथ औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर भी उल्लेखनीय कार्य किया। उनका कार्यकाल कुमाऊँ बागवानी का स्वर्णिम काल माना जाता है।

ब्रिटिश शासन द्वारा वर्ष 1932 में पर्वतीय क्षेत्रों में शीतोष्ण फलों के उत्पादन से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान—जैसे पौधारोपण, प्रवर्धन, मृदा प्रबंधन, खाद एवं सिंचाई, कटाई-छंटाई तथा कीट-रोग नियंत्रण—के विकास हेतु चौबटिया में हिल फ्रूट रिसर्च स्टेशन (पर्वतीय फल शोध केंद्र) की स्थापना की गई। यहाँ कार्यरत विशेषज्ञों में आर. एस. सिंह (हॉर्टिकल्चरिस्ट), एन. के. दास (मृदा रसायनज्ञ), यू. बी. सिंह (मायकोलॉजिस्ट) तथा आर. एन. सिंह (कीट विज्ञानी) प्रमुख थे।

भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1953 में अल्मोड़ा जनपद के माल रोड, रानीखेत स्थित किराये के भवनों में फल उपयोग विभाग, उत्तर प्रदेश (निदेशालय) की स्थापना की। बर्ष 1990 में निदेशालय का नाम परिवर्तित कर उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग उत्तर प्रदेश कर दिया गया।

शीतोष्ण फलों (सेब, नाशपाती, आड़ू, प्लम, खुबानी आदि) की पौध उत्पादन व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु 1955 से 1975 के मध्य चौबटिया, दूनागिरी एवं भरसार के अतिरिक्त कुल 78 नर्सरी एवं प्रजनन ऑर्चर्ड स्थापित किए गए।

चौबटिया गार्डन में संकलित सेब की कुछ प्रमुख किस्में

(1) शीघ्र पकने वाली किस्में-
अर्ली सनराइज़, फैनी, बिनौनी, ग्रीन स्वीट, रेड जून, किंग ऑफ पिपिन, टाइडमैन अर्ली वर्सेस्टर, रेड स्टिकन, समर गोल्ड पिपिन।
(2) मध्यम पकने वाली किस्में-
रेड डिलीशस, स्ट्राकिंग डिलीशस, गोल्डन डिलीशस, रॉयल डिलीशस, रिच-ए-रेड, रेड गोल्ड, मैकन्टोश, टॉप रेड, विंटर बनाना।
(3) देर से पकने वाली किस्में-
राइमर, वॉशिंगटन, रोम ब्यूटी।

भारत-इटली फल विकास परियोजना (1985–92) के अंतर्गत सेब की स्पर-टाइप किस्में—आर्गन स्पर, रेड चीफ, स्टार स्पर रेड, समर रेड, स्टार क्रीमसन, रेडिस्पर, गोल्ड स्पर—आदि किस्मों का उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों में बाग लगाए गए।

वर्तमान में एप्पल मिशन के अंतर्गत सेब की सघन एवं अति-सघन बागवानी में क्लोनल रूटस्टॉक M-9, MM-106 तथा MM-111 आदि पर रेड चीफ, आर्गन स्पर, स्कारलेट स्पर-II, जेरोमाइन, रेड वेलॉक्स, सुपर चीफ, शैलेट स्पर, किंग रॉट, रेड लम गाला, गाला मेमा, गेल गाला, फूजी एवं ग्रैनी स्मिथ जैसी किस्मों के पौधे तैयार कर रोपण किया जा रहा है।

उत्तराखंड में आलू की खेती का इतिहास-

आलू का उद्गम अमेरिकी महाद्वीप के पेरू देश से माना जाता है। यह फसल स्पेन के माध्यम से ब्रिटेन पहुँची और वहाँ से धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व में फैल गई। भारत में आलू की खेती को प्रोत्साहन देने का श्रेय गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स को जाता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल (1782– 1785) के दौरान आलू की खेती को बढ़ावा दिया।

उत्तराखंड में आलू की खेती सर्वप्रथम वर्ष 1823 में मेजर यंग द्वारा देहरादून के मसूरी क्षेत्र में प्रारंभ की गई। इसके पश्चात हेनरी रैम्जे ने कुमाऊँ क्षेत्र में आलू की खेती के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1864 में श्रीमती हैरी बर्जर द्वारा यूरोप से आलू का बीज मंगवाकर नैनीताल एवं आसपास के क्षेत्रों में आलू की खेती प्रारंभ की गई।

वर्ष 1884 में काठगोदाम और बरेली के मध्य रेल सेवा के शुभारंभ से अल्मोड़ा, नैनीताल एवं हल्द्वानी क्षेत्रों में उत्पादित आलू को देश के विभिन्न शहरों तक भेजना संभव हो सका, जिससे आलू की व्यवसायिक खेती को गति मिली।

वर्ष 1909 में नैनीताल जनपद के ज्योलिकोट क्षेत्र में आलू के उन्नत बीजों के उत्पादन हेतु कुमाऊँ सरकारी उद्यान की स्थापना की गई।

आलू बीज उत्पादन- –
वर्ष 1955 से 1975 के मध्य प्रत्येक जनपद में एक या दो राजकीयआलू बीज उत्पादन फार्म स्थापित किए गए। इनमें प्रमुख रूप से—
टिहरी गढ़वाल: धनौल्टी, काणाताल।
उत्तरकाशी: द्वारी, रैथल, जरमोला।
पौड़ी गढ़वाल: भरसार, खपरोली।
रुद्रप्रयाग: चिरवटिया, घिमतोली।
चमोली: परसारी, कोटी, रामणी।
देहरादून: गंगा लहरी।पिथौरागढ़: बलाती, मुनस्यारी, धारचुला।
अल्मोड़ा: पटौरिया, जागेश्वर।
नैनीताल: गागर,बमेठी रामगढ़ आदि।
उद्धम सिंह नगर: काशीपुर।

इन आलू फार्मों में हिमाचल प्रदेश के कुफरी अथवा अन्य उन्नत क्षेत्रों से आलू का फाउंडेशन बीज मंगाकर प्रमाणित बीज तैयार किया जाता था, जिसे स्थानीय एवं अन्य जनपदों के आलू उत्पादकों को बुवाई के समय मांग के अनुसार वितरित किया जाता था। वर्तमान में अधिकतर राजकीय आलू बीज उत्पादन प्रक्षेत्रों में आलू बीज उत्पादन नहीं हो रहा है।

आलू की लोकप्रियता-
पौष्टिक होने तथा कम लागत (अनाज की तुलना में आधी से भी कम) के कारण आलू शीघ्र ही स्थानीय जनमानस में अत्यंत लोकप्रिय हो गया और पर्वतीय आहार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

व्यवसायिक महत्व-
गर्मी के मौसम में, जब मैदानी क्षेत्रों में आलू की उपलब्धता कम रहती थी, उस समय उत्तराखंड का पहाड़ी आलू एक प्रमुख आपूर्ति स्रोत के रूप में उभर कर सामने आया। इससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हुआ और उनकी आय में वृद्धि हुई।

क्षेत्रीय विस्तार-
वर्तमान समय में उत्तराखंड के सभी पर्वतीय जनपदों में आलू की खेती व्यवसायिक स्तर पर की जा रही है और यह फसल पर्वतीय कृषि प्रणाली का अभिन्न अंग बन चुकी है।

वर्तमान में सेब एवं आलू उत्तराखंड की प्रमुख एवं महत्वपूर्ण व्यवसायिक फसलें बन चुकी हैं। इन फसलों ने राज्य की पर्वतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है तथा किसानों की आजीविका सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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