किसानों को डॉ. कुकसाल की सलाहः बीजों को अंकुरित करके ही करें भिंडी की बुवाई

डॉ. राजेंद्र कुकसाल जी का यह लेख किसानों के लिए बेहद व्यावहारिक और ज्ञानवर्धक है, विशेषकर भिंडी के बीज जमाव की समस्या का जो समाधान उन्होंने बताया है वह बहुत सटीक है।

Rajendra Kuksal
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डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 20 फरवरी, 2026ः भिंडी लोकप्रिय एवं लाभकारी सब्जी फसल है, जिसे लेडीज फिंगर या ओकरा के नाम से भी जाना जाता है। यह कम अवधि में तैयार होने वाली, अधिक उत्पादन देने वाली तथा बाजार में पूरे वर्ष मांग वाली फसल है। भिंडी की खेती मैदानी क्षेत्रों के साथ-साथ तराई एवं मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी फलियाँ पौष्टिक, स्वादिष्ट तथा औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं।

उन्नत किस्में- परभनी क्रांति, अर्का अनामिका, पूसा सावनी, वर्षा उन्नत आदि।

जलवायु – भिंडी के लिए दीर्घ अवधि का गर्म एवं नम वातावरण श्रेष्ठ माना जाता है। इसके लिए 27 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है।बीज जमाव हेतु 17 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान आवश्यक होता है।

भूमि – भिंडी की खेती के लिए उत्तम जल निकास वाली भूमि उपयुक्त रहती है। भूमि का पी.एच. मान 7.0 से 7.8 तथा कार्बन स्तर 0.8 के आसपास होना चाहिए।

बीज जमाव की समस्या- कृषकों की शिकायत रहती है कि भिंडी का बीज पूरी मेहनत से खेत में बोने के बाद भी जमाव नहीं होता या बहुत कम जमाव होता है।

भिंडी की बुवाई ग्रीष्मकाल एवं वर्षाकाल दोनों मौसमों में की जाती है। अगेती फसल से किसान अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं।

ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई फरवरी- मार्च में तथा वर्षाकालीन भिंडी की बुवाई जून- जुलाई में की जाती है। यदि भिंडी की फसल लगातार लेनी हो तो फरवरी से जुलाई के मध्य तीन सप्ताह के अंतराल पर अलग-अलग खेतों में भिंडी की बुवाई की जा सकती है।

बीज चयन- बुवाई से पूर्व बीजों को पानी से भरे बर्तन में डालें। स्वस्थ बीज बर्तन की सतह पर बैठ जाएंगे, जो बीज पानी में तैरने लगें उन्हें अलग कर दें। केवल स्वस्थ बीजों की ही बुवाई करें।

बीज की मात्रा- एक नाली (लगभग 200 वर्ग मीटर) क्षेत्र में— ग्रीष्मकालीन भिंडी की खेती हेतु लगभग 300 ग्राम बीज तथा वर्षाकालीन भिंडी की खेती हेतु लगभग 250 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

बीज उपचार- बीज को ट्राइकोडर्मा या बीजामृत से उपचारित करके ही बुवाई करें।

भिंडी बीज को अंकुरित कर बुवाई करने के लाभ-

भिंडी के बीज को खेत में बोने से पहले अंकुरित कर लेना अत्यंत लाभकारी है। इसके मुख्यतः दो लाभ हैं—
1 अगेती फसल लेने में सहायता- फरवरी- मार्च के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान कम रहता है, जबकि भिंडी बीज के जमाव हेतु 17 डिग्री सेल्सियस से अधिक औसत तापमान आवश्यक होता है। यदि बीज सीधे खेत में बो दिया जाए और उसे उचित तापमान न मिले, तो बीज खेत में ही पड़ा रह जाता है तथा कुछ समय बाद सड़ भी सकता है।

2 बीज की गुणवत्ता की जांच- भिंडी के बीज की जमाव क्षमता सामान्यतः केवल 1 से 2 वर्ष तक ही रहती है। विभागों/संस्थाओं द्वारा योजनाओं में कभी-कभी पुराना बीज कृषकों को उपलब्ध करा दिया जाता है। यदि बीज पुराना हो तो उसमें जमाव नहीं होता। इस प्रकार, बोने से पहले अंकुरण करा लेने से बीज का परीक्षण भी हो जाता है, अन्यथा पुराने बीज बोने पर कृषक का समय एवं मेहनत दोनों व्यर्थ हो जाते हैं।

बीज अंकुरण की विधि- बीज को रातभर पानी में भिगोकर फुला दें। ध्यान रहे कि पानी अधिक ठंडा न हो। इसके बाद बीज को निथार कर फुले हुए बीजों को एक पोटली में बांध लें। इस पोटली को आधा सड़े गोबर के ढेर के अंदर दबाकर 2 से 3 दिन तक रखें। इस प्रकार बीज का अंकुरण हो जाता है। बीज जमाव हेतु भूसे के ढेर के अंदर रखकर भी अंकुरण कराया जा सकता है।

बुवाई की दूरी (Spacing)-

ग्रीष्मकालीन फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी- 45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी- 20 सेमी तथा वर्षाकालीन फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी- 60 सेमी एवं पौधे से पौधे की दूरी -30 सेमी रखें।
बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है।

फसल चक्र का ध्यान रखें- जिस स्थान पर ग्रीष्मकालीन भिंडी की फसल ली गई हो, उसी स्थान पर वर्षाकालीन भिंडी की बुवाई न करें। ऐसा करने पर पौधे कमजोर होते हैं तथा रोगों का प्रकोप बढ़ता है, जिससे उपज कम प्राप्त होती है।

सिंचाई प्रबंधन-

ग्रीष्मकालीन भिंडी में 5 से 6 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। वर्षाकालीन फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।

फसल निगरानी-

फसल की 6 से 7 दिनों के अंतराल पर नियमित निगरानी करते रहें। यदि कहीं बीज न जमा हो या कीट द्वारा नुकसान हुआ हो तो ऐसे स्थानों पर शीघ्र पुनः बीज की बुवाई कर दें। निगरानी के दौरान यदि रोगग्रस्त या कीट प्रभावित पौधे दिखाई दें तो उन्हें तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें, जिससे रोग एवं कीटों का प्रसार कम हो सके।

पोषण प्रबंधन- खड़ी फसल में 20 से 30 दिनों के अंतराल पर 10 लीटर जीवामृत प्रति नाली की दर से देते रहना चाहिए।

पलवार (Mulch) का प्रयोग- भूमि सुधार, तापमान संतुलन, नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण तथा केंचुओं को अनुकूल वातावरण देने के लिए बुवाई के 2 से 3 सप्ताह बाद कतारों के बीच पलवार (मल्च) का प्रयोग करें। मल्च के लिए सूखी पत्तियाँ, पुआल, घास अथवा गोबर की खाद का प्रयोग किया जा सकता है।

फलियों की तुड़ाई- बीज बुवाई के लगभग 45 दिनों बाद फलियों की तुड़ाई प्रारंभ हो जाती है। जब फलियाँ हरी, मुलायम एवं रेशा रहित हों तभी तुड़ाई करें। ग्रीष्मकालीन भिंडी की फसल में हर तीसरे दिन तुड़ाई करनी चाहिए। समय पर तुड़ाई करने से पैदावार बढ़ती है।

पैदावार- उचित देखभाल करने पर, ग्रीष्मकालीन भिंडी से 1.5 से 2 क्विंटल प्रति नाली एवं वर्षाकालीन भिंडी से 3 से 3.5 क्विंटल प्रति नाली तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

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