पाले व शीत लहर से फसलों को कैसे बचाएं

Rajendra Kuksal
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डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 31 जनवरी, 2026ः जाड़ों के मौसम में शीत लहर एवं पाले से खड़ी फसलों को भारी नुकसान होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सामान्यतः नवंबर के मध्य से खड़ी फसलों पर ठंड व पाले का प्रभाव दिखाई देने लगता है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब जाड़ों में पाले एवं कोहरे का असर फसलों पर पहले की तुलना में अधिक देखने को मिल रहा है।

रात्रि के समय यदि तापमान 0 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाए, शाम को आकाश साफ रहे तथा हवा बंद हो, तो सुबह पाला पड़ने की संभावना अधिक होती है। ऐसी स्थिति में वायुमंडलीय तापमान को शून्य डिग्री से ऊपर बनाए रखना आवश्यक हो जाता है। पाले की अवस्था में पौधों के भीतर का पानी जम जाता है, जिससे उसका आयतन बढ़ जाता है और कोशिकाएँ फट जाती हैं। परिणामस्वरूप पत्तियाँ झुलस जाती हैं तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होने से फूल-फल नहीं लगते और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कई बार तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस या उससे भी नीचे चला जाता है, जिससे ओस की बूंदें जमकर पौधों, फूलों, फलियों एवं पत्तियों पर बर्फ का रूप ले लेती हैं। यदि यह अवस्था अधिक समय तक बनी रहे तो पौधे मर भी सकते हैं। पाला विशेष रूप से नवंबर मध्य से जनवरी तक अधिक पड़ने की संभावना रहती है।

पाला पड़ने से खड़ी फसलों में 20 से 70 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। औद्यानिक फसलों (फल, फूल एवं सब्जियाँ) में पाले का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। वर्षा काल में लगाए गए एक से तीन वर्ष आयु के फल पौधों—जैसे आम, लीची, केला, पपीता एवं अमरूद—को पाले से विशेष नुकसान होता है, इसलिए इन फसलों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। सब्जियों के साथ-साथ पपीता, आम, केला, लीची एवं अमरूद पर पाले का प्रभाव अधिक पड़ता है। टमाटर, मिर्च, बैंगन, मटर, चना, अलसी, सरसों, जीरा, धनिया एवं सौंफ जैसी फसलों में भी पाले के दिनों में अधिक नुकसान की आशंका रहती है, जबकि अरहर, गन्ना, गेहूं एवं जौ पर पाले का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है।

पाले का फसल पर प्रभाव:
पाले के कारण एक से तीन वर्ष आयु के वर्षा कालीन फल पौधों—विशेषकर आम, पपीता एवं लीची—की पत्तियाँ अचानक पीली पड़कर सूखने लगती हैं और गिर जाती हैं। खड़ी फसलों में फूल एवं फल झड़ने लगते हैं तथा फसल का हरा रंग समाप्त हो जाता है, पत्तियाँ मिट्टी के रंग जैसी दिखाई देने लगती हैं, जिससे सड़न एवं जीवाणुजनित रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। फल-फूल सूख जाते हैं, फलों पर धब्बे पड़ जाते हैं और उनका स्वाद भी खराब हो जाता है।

पाले के प्रभाव से मटर की फसल में दाने नहीं बनते। इसके अतिरिक्त फल एवं सब्जी फसलों में कीट एवं रोगों का प्रकोप भी बढ़ जाता है। कई बार सब्जियों की फसल शत-प्रतिशत तक नष्ट हो जाती है।

पाले से फसल बचाने के उपाय:
जिस रात पाला पड़ने की संभावना हो, उस रात 12 से 2 बजे के बीच खेत को ठंडी हवाओं से बचाने के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा में कूड़ा-कचरा या घास-फूस जलाकर धुआँ करना चाहिए। साथ ही हल्की सिंचाई करनी चाहिए। नमी युक्त मिट्टी में देर तक गर्मी बनी रहती है, जिससे खेत का तापमान 0.5 से 2.0 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

खड़ी फसलों में सूखी पत्तियों, घास-फूस या पुआल की मल्चिंग करें।

पाले की संभावना वाले दिनों में मिट्टी की गुड़ाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे मिट्टी का तापमान कम हो जाता है।

खेत के दोनों किनारों से प्लास्टिक की रस्सी की सहायता से फसलों पर जमी ओस को झाड़ देने से भी पाले से बचाव किया जा सकता है।

वर्षा काल में लगाए गए 1–2 वर्ष आयु के फल पौधों को पुआल, घास-फूस या प्लास्टिक शीट से ढककर सुरक्षित रखें। पपीता एवं आम के पौधों को बचाने हेतु प्रत्येक पौधे के चारों ओर पुआल की झोपड़ी बनाएं। पौधे को दबने से बचाने के लिए चार लकड़ियाँ लगाकर उनके ऊपर झोपड़ी रखें। ध्यान रहे कि झोपड़ी का दक्षिण-पूर्वी भाग खुला रहे, जिससे सूर्य का प्रकाश मिलता रहे। पौधों के थालों के चारों ओर पुआल या घास-फूस की मल्चिंग कर नियमित सिंचाई करें।

एक भाग पुराने गौमूत्र में छह भाग पानी मिलाकर खड़ी फसलों पर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से पाले का प्रभाव कम किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सादा ग्लूकोज 25–30 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। यदि फसल पाले से प्रभावित हो जाए तो तुरंत ग्लूकोज का छिड़काव लाभकारी होता है।

सरसों, गेहूं, चावल, आलू एवं मटर जैसी फसलों में सल्फर (गंधक) का छिड़काव करने से पौधों की रासायनिक सक्रियता बढ़ती है, जिससे पाले से बचाव के साथ-साथ सल्फर तत्व की पूर्ति भी होती है। पाले की संभावना वाले दिनों में सल्फर डस्ट 8–10 किलोग्राम प्रति एकड़ (20 नाली) की दर से बुरकाव करें या घुलनशील सल्फर 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। सल्फर पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा फसल को जल्दी पकाने में सहायक होता है।

पहाड़ी क्षेत्रों में ऊँचाई वाले स्थानों पर किसान जुलाई-अगस्त में आलू की खुदाई के बाद मटर की बुवाई करते हैं, जिसकी उपज अक्टूबर-नवंबर में दीपावली के आसपास मिलती है। नवंबर के अंतिम सप्ताह के बाद पाला पड़ने से मटर की फलियों में दाने नहीं बनते, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है। इससे बचाव के लिए अगस्त के प्रथम सप्ताह तक बुवाई अवश्य करें तथा कम अवधि में तैयार होने वाली ‘अर्किल’ किस्म का चयन करें।

नर्सरी में बीजों के अच्छे जमाव के लिए पुआल की मल्चिंग करें। नर्सरी पौध एवं सब्जियों को लो-कॉस्ट पॉली टनल में उगाना लाभकारी होता है। हवा की दिशा में वायुरोधी बोरों या टाट की टट्टियाँ क्यारियों के किनारों पर लगाने से पाले एवं शीत लहर से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है।

पौलीहाउस अथवा संरक्षित खेती अपनाकर भी पाले के प्रकोप से फसलों को बचाया जा सकता है।

दीर्घकालीन उपाय:
पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ पाला अधिक पड़ता है, वहाँ वर्षा कालीन फल पौधों का रोपण दक्षिण-पश्चिम ढाल वाले स्थानों पर करना चाहिए। इसके अतिरिक्त खेत की उत्तर-पश्चिमी मेड़ों पर तथा बीच-बीच में उचित स्थानों पर वायु अवरोधक पेड़ों का रोपण कर फसलों को पाले एवं शीत लहर से सुरक्षित रखा जा सकता है।

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