देहरादून/हल्द्वानी: उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में जैसे ही नवंबर-दिसंबर की ठंडक दस्तक देती है, माल्टा उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होने लगती हैं। पिछले 30 वर्षों से यह एक वार्षिक रस्म बन गई है—सरकारें आती-जाती हैं, मार्केटिंग के नए वादे होते हैं, लेकिन किसान की जेब आज भी खाली है।
1. वादों का ‘भूलभुलैया’ और जमीनी हकीकत
विगत दशकों में माल्टा की मार्केटिंग को लेकर कई प्रयोगों का दावा किया गया:
* निगमों को फंड: गढ़वाल (GMVN) और कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) को समय-समय पर ‘रिवॉल्विंग फंड’ देने की बात हुई ताकि वे सीधे किसानों से फल खरीदें।
* प्रोसेसिंग और कोल्ड स्टोरेज: रुद्रप्रयाग के तिलवाड़ा में प्रोसेसिंग यूनिट और अल्मोड़ा के कोसी मटैला में कोल्ड स्टोरेज के दावे किए गए, लेकिन इनका लाभ आज भी आम किसान की पहुंच से बाहर है।
* समर्थन मूल्य का ऊँट के मुँह में जीरा: 7 से 10 रुपये प्रति किलो का समर्थन मूल्य किसानों की लागत और मेहनत के सामने अपमानजनक प्रतीत होता है।
2. वाइन का सपना, देशी शराब की हकीकत
सरकार ने बड़े जोर-शोर से प्रचार किया था कि उत्तराखंड के माल्टा से ‘गोवा’ की तर्ज पर वाइन बनाई जाएगी। विडंबना देखिए, माल्टा की उच्च गुणवत्ता वाली वाइन तो बाजार में नहीं दिखी, लेकिन “माल्टा ब्रांड” के नाम पर टेट्रा पैक में देशी शराब गांव-गांव पहुंच गई। यह माल्टा की ब्रांडिंग है या उसका मजाक?
3. ‘संतरा’ बनाम ‘माल्टा’: उद्यान विभाग की बड़ी चूक?
90 के दशक तक पहाड़ों में संतरा (नारंगी) का प्रचुर उत्पादन होता था, जिसकी आज भी स्थानीय बाजार में भारी मांग और अच्छे दाम हैं। लेकिन उद्यान विभाग की नीतियों ने खेल बिगाड़ दिया:
* गलत वितरण: आरोप है कि कई बार संतरे की पौध के नाम पर किसानों को माल्टे की पौध थमा दी गई।
* लापरवाही: विभाग की उदासीनता से संतरे के पुराने बाग खत्म हो गए और नए विकसित नहीं किए गए।
* असंतुलन: आज बाजार में माल्टा अधिक है और खरीदार कम, जबकि संतरे की मांग पूरी करने वाला कोई नहीं।
4. जीआई टैग (GI Tag): क्या सिर्फ नाम ही काफी है?
साल 2023 में उत्तराखंड के माल्टा को भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिला। इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन किसान पूछ रहा है— “क्या टैग से मेरा पेट भरेगा या मुझे सही दाम मिलेगा?” बिना किसी ठोस दीर्घकालिक विपणन (Marketing) योजना के, जीआई टैग भी केवल एक सजावटी तमगा बनकर रह गया है।
> निष्कर्ष:
> उत्तराखंड का माल्टा उत्पादक आज हताश है। उसे ‘रिवॉल्विंग फंड’ या ‘समर्थन मूल्य’ की खैरात नहीं, बल्कि एक मजबूत सप्लाई चेन (Supply Chain) और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री चाहिए। जब तक विभाग अपनी नर्सरी से लेकर बाजार तक की नीतियों में सुधार नहीं करता, तब तक पहाड़ों में माल्टा केवल चर्चाओं का विषय बना रहेगा, समृद्धि का आधार नहीं।
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मैं इसमें आपकी और क्या मदद कर सकता हूँ?
* क्या आप चाहते हैं कि मैं इस विषय पर संबंधित अधिकारियों को भेजने के लिए एक औपचारिक पत्र (Memorandum) तैयार करूँ?
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उत्तराखंड का माल्टा: घोषणाओं के ‘सुनहरे बाग’ और किसानों की ‘कड़वी’ हकीकत
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