डॉ. राजेन्द्र कुकसाल, 18 जनवरी, 2026ः जैविक खेती और प्राकृतिक खेती दोनों ही कृत्रिम/सिंथेटिक रसायन-मुक्त खेती की पद्धतियाँ हैं, लेकिन इन दोनों में कई महत्वपूर्ण भिन्नताएँ हैं, जो इस प्रकार हैं-
1 अवधारणा और आधार:
जैविक खेती एक विदेशी पद्धति है, जिसमें बाहरी आदानों जैसे प्रमाणित बीज, कम्पोस्ट खाद, गोबर की खाद, केंचुए (Eisenia fetida) की खाद, जैविक उर्वरक, जैविक कीटनाशक तथा अन्य स्वीकृत जैविक इनपुट्स का उपयोग किया जाता है। जबकि, प्राकृतिक खेती ईश्वरीय व्यवस्था पर आधारित है। प्रकृति ने जीव- जन्तु, पेड़-पौधे सभी के जीवनयापन की सुदृढ़ व्यवस्था कर रखी है। जंगलों में खड़े बड़े-बड़े वृक्ष बिना मानवीय सहायता के हरे-भरे और स्वस्थ रहते हैं। यदि इन वृक्षों की पत्तियों का प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाए, तो उनमें किसी भी पोषक तत्व की कमी नहीं पाई जाती। ये सभी पोषक तत्व वे प्रकृति से ही प्राप्त करते हैं। प्राकृतिक खेती में कृषि कार्यों को प्रकृति के सिद्धांतों और नियमों के अनुरूप करने का प्रयास किया जाता है।
सबसे पहले जापान के किसान व दार्शनिक मसानोबू फुकुओका (Masanobu Fukuoka) ने 1975 में अपनी पुस्तक The One-Straw Revolution में प्राकृतिक कृषि पद्धति का वर्णन किया। दुनिया में प्राकृतिक खेती के कई मॉडल हैं, किंतु भारत में पद्मश्री सुभाष पालेकर का ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) मॉडल अधिक प्रचलित और मान्यता प्राप्त है। यह एक स्वदेशी पद्धति है, जिसमें बाहरी निवेशों के बिना प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक तरीके से खेती की जाती है। जीरो बजट प्राकृतिक खेती ZBNF ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्म पर आधारित है। ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त जानकारी को ज्ञान कहते हैं, घटनाओं को प्रयोग और तर्क से समझना विज्ञान है, तथा इन दोनों से आगे आध्यात्म है। प्रकृति के माध्यम से ईश्वर या उसकी शक्तियों को पहचानना आध्यात्म कहलाता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव का शरीर पंचतत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि (सूर्य), वायु और आकाश—से बना है। जीवन पूर्ण होने पर ये तत्व पुनः इन्हीं में विलीन हो जाते हैं। इसी प्रकार खाद्य- चक्र चलता रहता है।
100 किलोग्राम हरी फसल सुखाने पर लगभग 22 किलोग्राम सूखी घास प्राप्त होती है, अर्थात 78% जल निकल जाता है। इस 22 किलोग्राम सूखी घास को जलाने पर लगभग 1.5 किलोग्राम राख बचती है, यानी 20.5% वायु व अग्नि के रूप में वातावरण में समा जाता है और केवल 1.5% भूमि में मिलता है।
पेड़-पौधे अपना लगभग 98% पोषण हवा, पानी और सूर्य के प्रकाश से प्राप्त करते हैं तथा शेष 2% पोषण मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्मजीवों की सहायता से लेते हैं। प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा पौधे कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। शाकाहारी जीव वनस्पतियों पर और मांसाहारी जीव शाकाहारी जीवों पर निर्भर रहते हैं। इस प्रकार प्रकृति ने सभी जीवों के लिए एक सुदृढ़ खाद्य-चक्र की व्यवस्था कर रखी है।
प्राकृतिक खेती में देशी बीज, देशी गाय का गोबर, गौमूत्र और वनस्पति अर्क का उपयोग होता है। आच्छादन (फसल अवशेष) और जीवामृत के प्रयोग से मिट्टी के सूक्ष्मजीवों व देशी केंचुओं को सक्रिय किया जाता है, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है और बाहरी आदानों पर निर्भरता कम या शून्य हो जाती है। मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या ही मृदा- स्वास्थ्य निर्धारित करती है। मृदा को पहले निर्जीव माना जाता था, किंतु वास्तव में यह एक जीवंत, क्रियाशील तंत्र है, जिसके जैविक, रासायनिक और भौतिक गुण होते हैं। इनमें परिवर्तन से मृदा के स्वरूप और उत्पादकता पर प्रभाव पड़ता है। मृदा- स्वास्थ्य पोषण- सुरक्षा का मूल आधार है।
2 प्रमाणीकरण प्रणाली:
जैविक खेती में उत्पादों के प्रमाणीकरण के लिए तीसरे पक्ष की आवश्यकता होती है। भारत में National Programme for Organic Production (NPOP) के अंतर्गत प्रमाणीकरण किया जाता है, जो यूरोपीय मानकों और IFOAM के दिशानिर्देशों पर आधारित है। APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) इस कार्यक्रम की कार्यदाई संस्था है। निर्यात हेतु पंजीकरण अनिवार्य होता है। उत्तराखंड में इसके लिए उत्तराखंड बीज एवं जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण एजेंसी अधिकृत है। प्राकृतिक खेती में किसी तीसरे पक्ष के प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं होती। इसमें किसान और उपभोक्ता आपसी विश्वास के आधार पर मानकों का पालन सुनिश्चित करते हैं।
3 लागत और निवेश
जैविक खेती में अधिक मात्रा में कम्पोस्ट, जैविक खाद और अन्य इनपुट्स की आवश्यकता होती है, जिससे लागत बढ़ जाती है। जबकि जीरो बजट प्राकृतिक खेती ZBNF में जीवामृत, आच्छादन और सह- फसलों के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है, जिससे लागत बहुत कम रहती है।
4 फसल प्रणाली:
जैविक खेती में प्रायः मोनोकल्चर (एक समय में एक फसल) अपनाया जाता है। प्राकृतिक खेती मिश्रित फसल प्रणाली को बढ़ावा देती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है, कीट-रोग कम होते हैं और पोषक तत्वों का संतुलित चक्र विकसित होता है।
निष्कर्ष:
जैविक खेती एक तकनीकी प्रणाली है, जो रासायनिक आदानों को हटाती है, जबकि प्राकृतिक खेती एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो ज्ञान, विज्ञान, प्रकृति और आध्यात्म पर आधारित है तथा प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करती है।
