डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 27 जनवरी, 2026ः कुरमुला कीट (White Grub), जिसे गुबरैला या सफेद गिडार भी कहा जाता है, पहाड़ी क्षेत्रों में खरीफ मौसम के दौरान असिंचित (वर्षा आधारित) खेती में उगाई जाने वाली फसलों का एक प्रमुख एवं बहुभक्षी कीट है। यह कीट धान, मक्का, मडुवा, आलू, अदरक तथा लगभग सभी सब्जी फसलों को भारी क्षति पहुंचाता है। कुरमुला कीट की 30 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसका प्रकोप मुख्यतः जुलाई से अगस्त माह के दौरान अधिक देखने को मिलता है। किसी भी कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए आवश्यक है कि उसकी प्रकृति, स्वभाव, पहचान, प्रकोप तथा जीवन-चक्र की समुचित जानकारी हो। इन्हीं तथ्यों के आधार पर ही कीट का प्रभावी एवं स्थायी नियंत्रण संभव है।
कुरमुला कीट का जीवन- चक्र: इस कीट की चार अवस्थाएँ होती हैं।
- वयस्क (Adult / बीटल)
- अंडा (Egg)
- लार्वा / गुबरैला / गिडार (Grub)
- प्यूपा (Pupa)
1 वयस्क अवस्था: कुरमुला कीट का वयस्क भृंग (बीटल) लगभग 7 मि.मी. चौड़ा तथा 18 मि.मी. लंबा होता है। प्रारंभिक अवस्था में इसका रंग पीला होता है, जो बाद में चमकदार तांबे जैसा हो जाता है। वयस्क भृंग जून माह में सेब, अखरोट, आड़ू, मीठा पांगर, भीमल, खड़िक, तुन, तिमला, बेडू, हिसालू आदि वृक्षों की पत्तियाँ खाकर पौधों को पत्ती- विहीन कर देते हैं। प्रथम वर्षा के बाद मई–जून में सायंकाल के समय वयस्क गुबरैले मिट्टी से बाहर निकलते हैं, खेतों के आसपास की झाड़ियों एवं फलदार वृक्षों पर बैठकर पत्तियाँ खाते हैं तथा सुबह पुनः मिट्टी में चले जाते हैं।
2 अंडा अवस्था: मादा गुबरैला मैथुन के 4–6 दिन बाद मिट्टी में अंडे देना प्रारंभ कर देती है। इन्हीं अंडों से छोटे-छोटे गिडार निकलते हैं।
3 लार्वा (गिडार/कुरमुला) अवस्था: लार्वा प्रारंभिक अवस्था में सफेद रंग का होता है। पूर्ण विकसित गिडार का शरीर मोटा, मटमैला- सफेद तथा अंग्रेजी के “C” अक्षर के समान मुड़ा हुआ होता है। इसका सिर गहरे भूरे रंग का तथा मुखांग अत्यंत मजबूत होते हैं। गिडार जुलाई से अक्टूबर तक मिट्टी के भीतर सक्रिय रहकर फसलों एवं पौधों की जड़ों को काटते हैं। परिणामस्वरूप प्रभावित पौधे पीले पड़कर सूखने लगते हैं। यह अवस्था फसलों के लिए सबसे अधिक हानिकारक होती है।
4 प्यूपा अवस्था: शीत ऋतु में (दिसंबर–जनवरी) गिडार ठंड से बचने के लिए मिट्टी में गहराई तक जाकर सुषुप्त अवस्था में चले जाते हैं। मार्च–अप्रैल में तापमान बढ़ने पर वे पुनः ऊपरी सतह के पास आकर प्यूपा में परिवर्तित हो जाते हैं। लगभग 20–25 दिनों में प्यूपा से वयस्क गुबरैले निकलते हैं। इस प्रकार इस कीट का एक जीवन-चक्र एक वर्ष में पूरा होता है।
कीट नियंत्रण:
कुरमुला कीट का प्रभावी नियंत्रण तभी संभव है जब उसकी चारों अवस्थाओं—अंडा, लार्वा, प्यूपा एवं वयस्क बीटल— को लक्षित कर प्रबंधन किया जाए। केवल एक अवस्था के नियंत्रण से स्थायी समाधान संभव नहीं है।
कुरमुला कीट (White Grub) का नियंत्रण:
1 वयस्क अवस्था में यांत्रिक नियंत्रण: जून माह में जैसे ही वयस्क गुबरैले/बीटल वृक्षों एवं पौधों पर दिखाई देने लगें, सामूहिक प्रयास से उन्हें नष्ट करने का प्रयास करें। यह कीट लगभग एक सप्ताह तक वयस्क अवस्था में सक्रिय रहता है। इस हेतु जिन पौधों अथवा वृक्षों पर ये कीट सायंकाल में बैठते हैं, उनके नीचे त्रिपाल (प्लास्टिक शीट) बिछाकर पेड़ को हिलाने पर कीट नीचे गिर जाते हैं। इन्हें एकत्र कर आसानी से नष्ट किया जा सकता है।
2 प्रकाश प्रपंच (Light Trap) द्वारा नियंत्रण: प्रकाश प्रपंच की सहायता से वयस्क कीटों को एकत्र कर नष्ट करना एक प्रभावी उपाय है। जिन स्थानों पर गोबर एकत्र कर रखा जाता है, उनके आसपास लाइट ट्रैप लगाने से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा कुरमुला कीट नियंत्रण हेतु वी.एल. ट्रैप लाइट भी विकसित की गई है।
घरेलू प्रकाश प्रपंच बनाने की विधि:
- एक चौड़े मुँह वाले बर्तन (परात, तसला आदि) में पानी भरें।
- पानी में मिट्टी का तेल या कीटनाशी दवा की कुछ बूंदें मिला दें।
- बर्तन के ठीक ऊपर मध्य में एक विद्युत बल्ब लटका दें।
- यदि खेत में बिजली उपलब्ध न हो, तो बर्तन में दो ईंट या पत्थर रखकर उसके ऊपर लालटेन या लैम्प रखें।
- सायंकाल अंधेरा होने से लेकर रात्रि 9–10 बजे तक बल्ब/लालटेन/लैम्प जलाकर रखें।
- वयस्क गुबरैले प्रकाश से आकर्षित होकर उससे टकराते हैं और पानी में गिरकर मर जाते हैं।
- कृषि/उद्यान विभागों एवं बाजार में सोलर प्रकाश प्रपंच भी उपलब्ध हैं। पहली बारिश के बाद जून–जुलाई की रातों में 10–15 दिन तक लगातार ट्रैप का प्रयोग करें।
3 गोबर प्रबंधन: खेतों में केवल अच्छी तरह सड़ा हुआ गोबर ही प्रयोग करें। कच्चा गोबर खेत में कदापि न डालें, क्योंकि यह कुरमुला कीट को आकर्षित करता है।
4. कच्चे गोबर द्वारा लार्वा फंसाने की विधि:
- एक टिन के बर्तन या खाली कनस्तर में 4–5 दिन पुराना कच्चा गोबर भरें।
- किसी नुकीले औजार (कुटला आदि) से बर्तन में चारों ओर छेद कर लें।
- इस बर्तन को खेत के उस भाग में, जहाँ कुरमुला कीट का अधिक प्रकोप हो, जमीन में गाड़ दें।
- 2–3 दिनों में अधिकांश कुरमुले कच्चे गोबर की गंध से आकर्षित होकर छेदों के माध्यम से बर्तन के अंदर चले जाते हैं।
- बर्तन को बाहर निकालकर गोबर में उपस्थित लार्वा को नष्ट करें।
- यह प्रक्रिया 2–3 बार दोहराएं।
5 मेटाराइजियम (Metarhizium anisopliae) द्वारा जैविक नियंत्रण:
मेटाराइजियम एक लाभकारी कीट- नाशी फफूँद है।
- 1 किलोग्राम मेटाराइजियम को 25 किलोग्राम गोबर में अच्छी तरह मिलाएँ।
- मिश्रण को छाया में 7 दिन तक रखें।
- गोबर में नमी बनाए रखना आवश्यक है, जिससे फफूँद का माइसीलियम पूरे गोबर में फैल जाए।
- इस गोबर का प्रयोग अंतिम जुताई के समय 20 नाली क्षेत्र में करें।
6 ब्यूवेरिया बेसियाना (Beauveria bassiana):
ब्यूवेरिया बेसियाना भी एक प्रभावी लाभकारी जैविक कीट-नाशी फफूँद है। इसका प्रयोग भी मेटाराइजियम की भाँति ही करें।
रासायनिक नियंत्रण:
यदि जैविक एवं यांत्रिक विधियों से कीट का प्रभावी नियंत्रण न हो पाए, तब अनुशंसित रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करें।
1.वयस्क बीटल का नियंत्रण (पत्तियाँ खाने की अवस्था): वयस्क गुबरैले सेब, अखरोट, मीठा पांगर, आड़ू, भीमल, खड़िक, तुन, तिमला, बेडू, हिसालू आदि पौधों की पत्तियाँ लगभग एक सप्ताह तक खाते रहते हैं।
इस अवधि में इन पौधों पर
- मोनोक्रोटोफॉस / इमिडाक्लोप्रिड / मैलाथिय 2 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
- यदि बड़े वृक्षों पर छिड़काव संभव न हो, तो हिसालू, पांगर, भीमल, खड़िक आदि की कुछ टहनियाँ तोड़कर उन पर कीटनाशक का छिड़काव करें और वृक्ष के नीचे रख दें।
- गुबरैले जहरीली पत्तियाँ खाकर मर जाते हैं।
2.मिट्टी उपचार (फोरेट):
बुवाई के समय खेत में फोरेट 10 जी @ 500 ग्राम प्रति नाली की दर से मिट्टी में मिलाएं।
3. क्लोरपायरीफॉस द्वारा लार्वा नियंत्रण:
- क्लोरपायरीफॉस 80 मि.ली. दवा को 1 किलोग्राम रेत या भुरभुरी सूखी मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं।
- दवा मिलाते समय हाथों में दस्ताने पहनें। (दस्ताने न हों तो हाथ पर पॉलिथीन थैली लपेटें और लकड़ी की डंडी से मिश्रण करें।)
- 1 किलोग्राम दवा-मिश्रित रेत 1 नाली भूमि के उपचार हेतु पर्याप्त होती है। बुरकाव के समय खेत में पर्याप्त नमी होना अनिवार्य है।
