डॉ. राजेंद्र कुकसाल, देहरादून, 15 जनवरी, 2026:
उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित क्षेत्रों में नवंबर- दिसंबर के महीने में पेड़ों पर लदे सुनहरे माल्टा के फल यहाँ की पहचान हैं। माल्टा केवल एक पारंपरिक फल ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पहाड़ों की आर्थिकी का एक सशक्त आधार भी है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और वर्गीकरण उत्तराखंड में नींबूवर्गीय (Citrus) फलों का इतिहास बहुत पुराना है, जिसका उल्लेख 1882-86 के ‘हिमालयन गैजेटियर’ (E.T. Atkinson) में भी मिलता है।
नींबूवर्गीय फलों के अंतर्गत सिट्रस की प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं:
1 माल्टा/मौसम्बी Sweet Orange (C.sinensis) नाम देने का बर्ष 1757 उत्पत्ति स्थान चीन ।
2 संतरा/नारंगी Mandarin ( C. reticulate) नाम देने का बर्ष 1837 उत्पत्ति चीन।
3 नींबू Common Lime (C.aurantifolia) 1913.
4 पहाड़ी नींबू/गलगल Lamon
5 ग्रेप फ्रूट Grape fruit
6 चकोतरा Pomelo
7 किन्नो Kinnow (हाइब्रिड किस्म) King x Willow leaf का क्रास कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के डा० एच वी फ्रास्ट द्वारा 1915 में विकसित किया गया। हिमाचल/पंजाब/राजस्थान में साठ के दशक में किन्नू के बाग लगने शुरू हुए जिनसे वर्तमान में अच्छा उत्पादन लिया जा रहा है।
उत्पादन के घटते आंकड़े: एक चिंता का विषय
उद्यान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 में नींबूवर्गीय फलों का क्षेत्रफल 21,739 हेक्टेयर और उत्पादन 91,177 मीट्रिक टन था। विडंबना यह है कि 2023 के आंकड़ों में यह घटकर क्रमशः 9,992 हेक्टेयर और 36,912 मीट्रिक टन रह गया है। यह गिरावट उद्यान विभाग की कार्यप्रणाली और बागवानों के मोहभंग की ओर इशारा करती है।
माल्टा: स्वास्थ्य का खजाना और औषधीय गुणों की खान
माल्टा केवल एक फल नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा दिया गया एक स्वास्थ्य वर्धक उपहार है। खट्टे-मीठे और रसीले स्वाद वाला यह फल पौष्टिकता के मामले में अद्वितीय है।
पोषक तत्वों का भंडार
विटामिन-सी की प्रचुरता: माल्टा विटामिन-सी का सर्वोत्तम स्रोत है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को फौलादी बनाने में मदद करता है।
खनिज तत्व: इसमें पोटेशियम, कैल्शियम और आयरन जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं, जो हड्डियों और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं।
डिटॉक्सिफिकेशन: अपने एंटीसेप्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण यह शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने (डिटॉक्स करने) में सहायक है।
सर्दी- जुकाम में रामबाण: प्रोटीन और फाइबर से युक्त होने के कारण, सर्दी, खांसी और जुकाम जैसी मौसमी बीमारियों में इसका सेवन बेहद लाभकारी होता है।
बहुआयामी उपयोग
माल्टा का हर हिस्सा उपयोगी है। इसके फलों का रस जहाँ ताज़गी देता है, वहीं इसके छिलकों का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले सौंदर्य प्रसाधनों (Cosmetics) में किया जाता है। इसके अलावा, माल्टा के बीज के तेल और छिलकों से कई प्रकार की जीवनरक्षक औषधियां भी तैयार की जाती हैं।
पहाड़ों का ‘शुद्ध जैविक’ उपहार उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में माल्टा के उत्पादन में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग न के बराबर होता है। यही कारण है कि यहाँ का माल्टा पूरी तरह से ‘विशुद्ध जैविक’ (Pure Organic) श्रेणी में आता है, जो इसे वैश्विक बाजार के लिए एक प्रीमियम उत्पाद बनाता है।
विडंबना:
माल्टा फल में इतने सारे स्वास्थ्यवर्धक व औषधीय गुण होने के बावजूद माल्टा उत्पादकों को इसका उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
बिगत बीस -तीस वर्षों से नवम्बर – दिसम्बर माह आते ही हर बर्ष विपणन की समस्या को लेकर माल्टा फल चर्चाओं में आ जाता है।
कभी गढ़वाल एवं कुमाऊं मंडल विकास निगम को स्पेसल रिवाल्विंग फन्ड देकर माल्टा बेचने की बात हुई कभी तिलवाड़ा जनपद रुद्रप्रयाग में गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा माल्टा फल के प्रोसेसिंग की बात, कभी पौड़ी गढ़वाल, मटैला अल्मोड़ा में कोल्ड स्टोरेज की बात कभी किसानों को कलेक्सन सेन्टर पर पहुंचाने पर 7-8-9 एवं 10 रुपये प्रतिकिलो समर्थन मूल्य MSP देने की बात कभी उत्तराखंड के माल्टा से गोवा में बनेगी बाइन (माल्टा फलों से वाइन तो नहीं बनी किन्तु माल्टा के नाम पर टेट्रा पैक में उत्तराखंड में देशी दारू जरूर घर घर बिक रही है) , बर्ष 2023 में देवभूमि जैविक उत्पादक संघ प्राइवेट लिमिटेड ज्योलीकोट नैनीताल को माल्टा फल हेतु जीआई टैग मिलने की बात आदि इतने सारे सरकारों के प्रयास/ दाबों के बावजूद इस बर्ष भी माल्टा उत्पादकों के चेहरे अच्छे भाव न मिल पाने के कारण उदास है।
सरकारों की कोई दीर्घकालिक योजना न होने के कारण माल्टा उत्पादक हतास व निराश हैं।
समाधान और सुझाव
तत्काल प्रबंधन के उपाय:
प्रचार-प्रसार: माल्टा फल के पौष्टिक व औषधीय गुणों का व्यापक स्तर पर ब्रांडिंग और प्रचार किया जाए।
समर्थन मूल्य MSP में वृद्धि: उत्पादन में लागत के हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाय ।
परिवहन सब्सिडी: किसानों को मंडियों तक फल भेजने के लिए ट्रांसपोर्ट सब्सिडी दी जाए।
संस्थागत सुदृढ़ीकरण: उत्तराखंड औद्यानिक परिषद को सुदृढ़ व सक्रिय किया जाय। सेब की तर्ज पर माल्टा फल हेतु भी अनुदान पर पैकिंग पेटियां/बाक्स उपलब्ध कराई जाएं।
कोल्ड हाउसिंग: गर्मियों में उच्च मांग को देखते हुए माल्टा उत्पादक क्षेत्रों में छोटे स्तर पर कूल हाउस/कोल्ड स्टोरेज का निर्माण किए जाएं।
जी आइ टैग का उपयोग: उत्तराखंड के माल्टा फल को जी आई टैग भौगोलिक संकेतांक मिलना राज्य सरकार की उपलब्धि है किन्तु इसका लाभ माल्टा उत्पादकों को कैसे मिलें कृषकों को इसकी कोई जानकारी नहीं है टैग का लाभ किसानों को मिले इस दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।
सफलता की राह: प्रसंस्करण और सामुदायिक सहकारिता (पिथौरागढ़ मॉडल)
उत्तराखंड में माल्टा और अन्य स्थानीय उत्पादों के बेहतर भविष्य के लिए पिथौरागढ़ जनपद का “ध्वज आजीविका स्वायत्त सहकारिता, कनालीछीना” एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरा है। हिलांस फल प्रसंस्करण ग्रोथ सेंटर के रूप में संचालित यह संस्थान ‘एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना’ (ILSP) के तकनीकी सहयोग से एक बड़ी सफलता की कहानी लिख रहा है। पिथौरागढ़ के इस सफल मॉडल की तर्ज पर राज्य के अन्य हिस्सों में स्थित राजकीय फल संरक्षण केंद्रों को भी सक्रिय किया जा सकता है। यदि सरकार इन केंद्रों को आधुनिक मशीनों और कुशल प्रबंधन से जोड़ दे, तो पहाड़ी उत्पादों की बर्बादी रुकेगी और किसानों की आय में कई गुना वृद्धि होगी।
इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएं:
विविध उत्पादों का प्रसंस्करण: यहाँ केवल माल्टा ही नहीं, बल्कि बीजू आम, आंवला, बुरांश और लिंगुड़ा जैसे स्थानीय उत्पादों का भी प्रसंस्करण (Processing) किया जाता है।
बहुआयामी उत्पाद: स्थानीय फलों से केवल जूस ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार के पेय, अचार और बड़ी कंपनियों के लिए ‘पल्प’ (Pulp) भी तैयार किया जाता है।
स्थाई रोजगार और आत्मनिर्भरता: जहाँ अन्य जनपदों में नवंबर-दिसंबर में माल्टा के बाजार न मिलने पर निराशा होती है, वहीं यह केंद्र स्थानीय स्तर पर फल खरीदकर ग्रामीणों को उचित मूल्य दिला रहा है। इससे न केवल समूह के सदस्य आत्मनिर्भर हो रहे हैं, बल्कि स्थानीय लोगों को स्थाई रोजगार भी मिल रहा है।
दीर्घकालिक रणनीति:
गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन: जेनेटिक रूप से शुद्ध ‘न्यूसेलर सीडलिंग’ (Nucellar Seedling) तकनीक से पौधे तैयार किए जाएं, जैसा केवीके जाखधार (रुद्रप्रयाग) में किया जा रहा है।
पारदर्शी जीर्णोद्धार: पुराने बागों के जीर्णोद्धार हेतु बजट का सीधा लाभ (DBT) किसानों को मिले, न कि केवल कागजों पर निम्न स्तर की दवाओं का वितरण हो।
जैविक प्रमाणीकरण: जैविक घोषित जनपदों के माल्टा का उचित प्रमाणीकरण कर उसे प्रीमियम बाजार में उतारा जाए।
