Organic Farming: जैविक खेती में क्यों महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं Bio-fertilizers

Rajendra Kuksal
5 Min Read

डॉ. राजेन्द्र कुकसाल, देहरादून, 20 जनवरी, 2026ः जैव उर्वरक (बायो- फर्टिलाइज़र) प्राकृतिक उत्पाद होते हैं, जिनमें जीवित सूक्ष्मजीव (जीवाणु/कवक) होते हैं। ये पौधों को आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा उन्हें ग्रहण करने में सहायता करते हैं। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए कुल 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनमें से तीन — कार्बन, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन — पौधे वायुमंडल से प्राप्त करते हैं, जबकि शेष 13 पोषक तत्व मिट्टी से मिलते हैं। इनमें नाइट्रोजन और फॉस्फोरस अत्यंत आवश्यक पोषक तत्व हैं, जो पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन के लिए जरूरी होते हैं।

नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस पौधों को तीन स्रोतों से प्राप्त होते हैं –
1रासायनिक खाद (यूरिया, डीएपी, म्यूरेट ऑफ पोटाश आदि)

2 जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, मुर्गी की खाद, हड्डियों का चूरा, मछली की खाद आदि)

3 जैव उर्वरकों द्वारा (नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फॉस्फोरस घुलनशील जीवाणु)

जैविक खेती में रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता, इसलिए पोषण की पूर्ति हेतु जैव उर्वरकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। प्राकृतिक रूप से मिट्टी में कुछ ऐसे जीवाणु पाए जाते हैं, जो वायुमंडल में उपस्थित 78% नाइट्रोजन को — जिसे पौधे सीधे उपयोग नहीं कर सकते — अमोनिया व नाइट्रेट में बदल देते हैं। इसी प्रकार ये जीवाणु अघुलनशील फॉस्फोरस को भी घुलनशील रूप में बदलते हैं। जैव उर्वरक ऐसे ही उपयोगी जीवाणुओं का उत्पाद हैं, जो पौधों को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा वृद्धि कारक तत्व उपलब्ध कराते हैं और पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखते हैं।

जैव उर्वरकों को जीवाणु खाद, जैव कल्चर, टीका या इनोकुलेंट भी कहा जाता है।

जैव उर्वरकों के प्रकार

  • राइजोबियम कल्चर
  • एजोटोबैक्टर कल्चर
  • एजोस्पाइरिलम कल्चर
  • फास्फोटिका कल्चर

1राइजोबियम जीवाणु खाद

यह नम चारकोल में मिश्रित राइजोबियम जीवाणुओं का उत्पाद है। एक ग्राम में करोड़ों जीवाणु होते हैं। इसका उपयोग केवल दलहनी फसलों में किया जाता है और यह फसल-विशिष्ट होता है। बीज उपचार के बाद ये जीवाणु जड़ों में प्रवेश कर ग्रंथियाँ बनाते हैं, जहाँ नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है। ग्रंथियों की संख्या जितनी अधिक होगी, उत्पादन उतना ही अधिक होगा।

प्रयोग विधि

  • 200 ग्राम कल्चर से 10–12 किग्रा बीज उपचारित किए जा सकते हैं।
  • 200 ग्राम कल्चर + 200 ग्राम गुड़ + 300–400 मि.ली. पानी मिलाकर घोल बनाएँ, बीजों पर लेप करें, छाया में सुखाकर तुरंत बुवाई करें।

लाभ

  • 10–30 किग्रा/हेक्टेयर नाइट्रोजन की बचत
  • 20–35% उपज वृद्धि
  • हार्मोन व विटामिन उत्पादन
  • अगली फसलों को भी लाभ मिलता है।

2 एजोटोबैक्टर / एजोस्पाइरिलम
ये स्वतंत्रजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु हैं, जो सभी फसलों में उपयोगी हैं।

लाभ

  • 10–20% उपज वृद्धि
  • 10–20 किग्रा/हेक्टेयर नाइट्रोजन बचत
  • जड़ों का तेज विकास
  •  रोगजनकों का दमन
  • सूखा व तेज हवा सहनशीलता

3 फास्फोटिका जीवाणु खाद
यह अघुलनशील फॉस्फोरस को घुलनशील बनाता है।

लाभ

  • 10–20% उपज वृद्धि
  • 30–50% फॉस्फोरस बचत
  • जड़ों का बेहतर विकास।

ट्राइकोडरमा
ट्राइकोडरमा एक जैव नियंत्रक है, जो फ्यूजेरियम, राइजोेक्टोनिया, पिथियम जैसे रोगकारक कवकों को नियंत्रित करता है। यह फसल अवशेषों को विघटित कर खाद बनाने में भी सहायक है। इसे सड़ी हुई कम्पोस्ट खाद में मिलाकर प्रयोग किया जाता है।

माइकोराइजा
यह फफूंद पौधों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाती है।
प्रकार:
एक्टोमाइकोराइजा
इंडोमाइकोराइजा

  • लाभ
    फॉस्फोरस, पोटाश, कैल्शियम व सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता
  • साइटोकाइनिन हार्मोन की आपूर्ति
  • लीची जैसी फसलों में अनिवार्य

जैव उर्वरकों की प्रयोग विधियाँ
1. बीज उपचार
200 ग्राम कल्चर से 10 किग्रा बीज उपचारित करें।
घोल बनाकर बीजों पर लेप करें, 30 मिनट सुखाकर बुवाई करें।
2. पौध जड़ उपचार
1 किग्रा कल्चर + 10 लीटर पानी
जड़ों को 30–40 मिनट डुबोकर रोपाई करें।
3. कंद/कलम उपचार
2 किग्रा कल्चर + 20 लीटर पानी
30 मिनट डुबोकर बुवाई करें।
4. मृदा उपचार
1–1.5 किग्रा कल्चर + 50 किग्रा गोबर खाद
24 घंटे छाया में रखें, फिर खेत में छिड़कें।

जैव उर्वरकों के सामान्य लाभ

  • दलहनी फसलों में 40–300 किग्रा/हेक्टेयर नाइट्रोजन स्थिरीकरण
  • अन्य फसलों में 10–50 किग्रा/हेक्टेयर नाइट्रोजन
  • फॉस्फोरस उपलब्धता 15–40 किग्रा/हेक्टेयर
  • 10–30% उपज वृद्धि
  • 20–40% रासायनिक उर्वरक बचत
  • हार्मोन व विटामिन उत्पादन
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
  • सुरक्षित, सस्ते, प्रदूषणमुक्त

सावधानियाँ

  • प्रमाणित संस्था का कल्चर ही लें
  • फसल के अनुसार सही कल्चर प्रयोग करें
  • ताज़ा पैकेट का प्रयोग करें
  • रसायनों के साथ न मिलाएँ
  • ठंडी, छायादार जगह पर भंडारण करें
  • उपयोग के समय ही पैकेट खोलें
  • फफूंदनाशक के बाद दोगुनी मात्रा में कल्चर लगाएँ
  • उपचार के तुरंत बाद बुवाई/रोपाई करें।
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