डॉ. राजेन्द्र कुकसाल, 23 जनवरी, 2026ः उत्तराखंड सरकार द्वारा सेब मिशन के अंतर्गत सेब में उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से सेब की अति सघन बागवानी योजना चलाई जा रही है। राज्य में अधिकांश सेब के बगीचे सीडलिंग (बीजू) रूट स्टॉक पर लगाए गए हैं। सीडलिंग रूट स्टॉक पर आधारित सेब के बाग लगाने में पौधों को अधिक दूरी पर लगाया जाता है, क्योंकि जैसे-जैसे पेड़ बड़े होते हैं, उनका फैलाव काफी बढ़ जाता है। इसके साथ-साथ जड़ों का फैलाव भी उसी अनुपात में होता है, जिससे पेड़ अधिक भूमि घेर लेते हैं। एक हेक्टेयर क्षेत्र में सीडलिंग रूट स्टॉक पर ग्राफ्ट किए गए लगभग 250–300 सेब के पौधे ही लगाए जा सकते हैं। वहीं, सेब की सघन बागवानी में पेड़-से-पेड़ की दूरी कुछ ही फीट रखी जाती है। इस तकनीक में क्लोनल रूट स्टॉक वाले पौधों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें जड़ों का फैलाव कम होता है तथा मूसला जड़ नहीं होती।
पारंपरिक बागवानी में जितनी भूमि में एक सेब का पेड़ लगाया जाता है, उतनी ही भूमि में सघन बागवानी के अंतर्गत लगभग 10 पेड़ लगाए जा सकते हैं। पारंपरिक किस्मों के स्थान पर सघन बागवानी में फ्यूजी, गाला, इडा रेड, पैसिफिक रोज, रेड विलौक्स, जैरोमाइन, मैमा मास्टर, किंग रोट, फैन जेड, डार्क वैरन आदि किस्में प्रचलित हैं। जिन क्षेत्रों में बागवान क्लोनल रूट स्टॉक पर सेब की खेती कर रहे हैं, वहाँ सीडलिंग आधारित बागों की तुलना में 8 से 10 गुना अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है।
सेब की सघन बागवानी के लाभ:
कम क्षेत्रफल में अधिक पौधे लगाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
सघन बागवानी में लगाए गए पौधे पारंपरिक प्रजातियों की तुलना में कम समय में उत्पादन देने लगते हैं।
उत्पादन लागत में अपेक्षाकृत कम खर्च आता है।
बगीचे का प्रबंधन सरल होता है।
बौनी (Dwarf) तथा अर्ध-बौनी (Semi- Dwarf) प्रजातियाँ लगभग 3 वर्ष में फल देना शुरू कर देती हैं।
पौधे छोटे होने के कारण रख-रखाव तथा फल तुड़ाई आसान होती है।
समान आकार और रंग के फल बाजार के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं।
सेब की सघन बागवानी में रूट स्टॉक
सेब के पौधों की वृद्धि (ग्रोथ) रूट स्टॉक की वृद्धि प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। कम वृद्धि वाले रूट स्टॉक पर पौधा भी छोटा रहता है। रूट स्टॉक पौधे को मिट्टी में स्थिर रखने के साथ-साथ पानी एवं खनिज पोषक तत्वों का अवशोषण करता है।
रूट स्टॉक को मुख्यतः दो समूहों में बाँटा जा सकता है।
1 सीडलिंग रूट स्टॉक- राज्य में अधिकांश सेब के बाग अभी भी क्रैब एप्पल (Malus baccata) एवं महाराजी के सीडलिंग रूट स्टॉक पर उगाए गए हैं। कुछ स्थानों पर विशेष ट्रेनिंग एवं प्रूनिंग तकनीकों के माध्यम से सीडलिंग रूट स्टॉक पर भी अति सघन बागवानी की जा रही है।
2.क्लोनल रूट स्टॉक- ये रूट स्टॉक बौने, शीघ्र फल देने वाले, गुणवत्तायुक्त फल देने वाले तथा कुछ कीट-रोगों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता इनकी एकरूपता है।
क्लोनल रूट स्टॉक का विकास
गुणवत्तायुक्त सेब उत्पादन हेतु सर्वप्रथम यूनाइटेड किंगडम के ईस्ट मॉलिंग रिसर्च सेंटर में एम-एम एवं एम-ए (Malling एवं Malling- Merton) श्रृंखला के रूट स्टॉक विकसित किए गए। आज विश्वभर में सघन सेब बागवानी में इन्हीं रूट स्टॉक्स का प्रयोग किया जाता है। ईस्ट मॉलिंग रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक मार्टिन को रूट स्टॉक का जनक माना जाता है।
रूट स्टॉक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं।
1 टिश्यू कल्चर आधारित रूट स्टॉक।
2 क्लोनल रूट स्टॉक।
क्लोनल रूट स्टॉक जड़ों द्वारा तैयार किए जाते हैं, जिनसे तीन प्रकार के पौधे प्राप्त होते हैं—
1ड्वार्फ (Dwarf)
2सेमी-ड्वार्फ (Semi-Dwarf)
3विगरस (Vigorous) इन्हें मुख्यतः माउंड लेयरिंग एवं ट्रेंच लेयरिंग विधि से तैयार किया जाता है।
टिश्यू कल्चर से सेब के पांधे बनाने के लिए प्रयोगशालाओं में मादा पौधे के एक छोटे से भाग से हजारों पौंधे बनायें जाते हैं। इन पौंधों को एक प्रकार के मिट्टी रहित मीडिया में तैयार किया जाता है, जिसमें सभी प्रकार के जरूरी पोषक तत्वों को मिलाया जाता है। यही पोषक तत्व पौंधे को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रमुख क्लोनल रूट स्टॉक एवं उनके गुण-दोष
M-9 – यह सर्वाधिक प्रचलित एवं उच्च उत्पादन देने वाला रूट स्टॉक है। इससे तैयार पौधे की अधिकतम ऊँचाई 12–13 फीट तक होती है। यह हाई-डेंसिटी बागवानी के लिए उपयुक्त है तथा फाइटोफ्थोरा कॉलर रॉट रोग के प्रति प्रतिरोधी है। मूसला जड़ न होने के कारण सहारे एवं नियमित सिंचाई की आवश्यकता रहती है। Burr knots विकसित होने की प्रवृत्ति के कारण इन पौधों में वोरर ऊली एफिस व अन्य कीट आसानी से आक्रमण करते हैं।
इस रूटस्टॉक पर सेब की गाला, फूजी एवं रेड डिलिशियस की सेमी विगरस किस्में तैयार की जा सकती हैं। इस प्रकार के रूटस्टॉक के पौधों को अधिक उपजाऊ, समतल भूमि में, जहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो, वहीं लगाना चाहिए।
M 26- यह रूटस्टॉक M 9 की अपेक्षा थोड़ा बड़ा होता है। आकार की दृष्टि से यह सीडलिंग का लगभग 40–45 प्रतिशत होता है। इस रूटस्टॉक पर किस्म के अनुसार ड्वार्फ (बौना) या सेमी ड्वार्फ (अर्ध-बौना) पौधा तैयार किया जाता है। इसे कम नमी वाले क्षेत्रों में लगाया जाना चाहिए तथा इसे सहारे की आवश्यकता भी अपेक्षाकृत कम होती है।
M 27 – यह सेब की सबसे बौनी रूटस्टॉक प्रजाति है। इस पर तैयार पौधों की अधिकतम ऊँचाई 5–6 फीट तक होती है। पौधे को सीधा रखने के लिए सहारे की आवश्यकता होती है। इस रूटस्टॉक पर तैयार पौधों को गमलों में भी लगाया जा सकता है।
MM 106 – यह रूटस्टॉक M 26 की तुलना में थोड़ा अधिक बड़ा होता है तथा आकार में सीडलिंग का लगभग 50–60 प्रतिशत होता है। इस पर सेब की सेमी ड्वार्फ (अर्ध-बौनी) किस्में तैयार की जाती हैं। इस रूटस्टॉक पर तैयार पौधों को सामान्यतः सहारे की आवश्यकता नहीं होती। यह सबसे अधिक प्रचलित एवं व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला रूटस्टॉक है।
MM 111- यह रूटस्टॉक MM 106 की अपेक्षा और अधिक बड़ा होता है। आकार की दृष्टि से यह सीडलिंग का लगभग 80–85 प्रतिशत होता है। इस रूटस्टॉक का उपयोग विशेष रूप से रेड डिलिशियस किस्म के पौध तैयार करने में किया जाता है। यह सूखा प्रतिरोधी है तथा इससे तैयार पौधे लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में लगाए जा सकते हैं।
मूलवृंतों के चयन में ध्यान देने योग्य बिंदु
किस्मों की वृद्धि प्रवृत्ति (Vigour) एवं विकास।
क्षेत्र की ऊँचाई – ऊँचाई बढ़ने के साथ पौधों की वृद्धि प्रवृत्ति घटती जाती है।
मिट्टी की उर्वरता – अधिक वृद्धि प्रवृत्ति वाले मूलवृंत कम उपजाऊ मिट्टी के लिए उपयुक्त होते हैं।
मिट्टी की नमी एवं भुरभुरापन – दोमट मिट्टी में पौधे बेहतर पनपते हैं क्योंकि इसमें जल धारण क्षमता, जल निकास एवं भुरभुरापन संतुलित होता है। हल्की रेतीली मिट्टी में नमी की कमी के कारण पौधों की वृद्धि कम होती है। चिकनी मिट्टी में जल धारण क्षमता अधिक होती है, परंतु अधिक वर्षा एवं सर्दियों में जलभराव तथा जड़ों में वायु की कमी की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
किस्में एवं रूट स्टॉक
उच्च घनत्व बागवानी में प्रायः उच्च रंग वाली मानक या स्पर टाइप किस्मों का चयन किया जाता है। जैसे-जैसे समुद्र तल से ऊँचाई बढ़ती है, फलों का रंग गहरा होता जाता है।अत्यधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में अधिक रंग वाली किस्मों में फल का रंग गहरा परंतु आकार छोटा रह जाता है, जिससे बाजार मूल्य घटता है। इसलिए अधिक रंग वाली किस्में कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में तथा कम रंग वाली किस्में अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में लगानी चाहिए। गाला किस्में अधिक ऊँचाई पर अपेक्षित आकार नहीं ले पातीं।
किस्मों की वृद्धि प्रवृत्ति
स्पर किस्में – रेड चीफ, सुपर चीफ, स्कारलेट स्पर, शेलेट स्पर।
सेमी-स्पर किस्में – ओरेगॉन, किंग रॉट।
स्टैंडर्ड किस्में – जैरोमाइन, रेड वीलोक्स।
स्टैंडर्ड किस्मों की तुलना में स्पर किस्में आकार में छोटी एवं कम फैलाव वाली होती हैं। यदि स्पर किस्मों को M 9 पर अधिक उपजाऊ मिट्टी में लगाया जाए तो पौधे अपेक्षाकृत बड़े हो सकते हैं। वहीं, रेड डिलिशियस को मध्यम वृद्धि वाले मूलवृंत पर लगाने से पौधा बड़ा आकार ग्रहण करता है। ऐसे पौधों के लिए उचित दूरी पर रोपण आवश्यक है।
ऊँचाई के अनुसार किस्मों का चयन
5000–6000 फीटः रेड चीफ, ऑर्गन स्पर, स्कारलेट स्पर-II, जैरोमाइन, रेड वीलोक्स, सुपर चीफ, शेलेट स्पर।
6000–7500 फीटः रॉयल डिलिशियस, सुपर चीफ, किंग रॉट, रेड लम गाला, गाला मेमा, रेड वीलोक्स, जैरोमाइन।
शुष्क शीतोष्ण क्षेत्र
टॉप रेड, सुपर चीफ, जैरोमाइन, रेड वीलोक्स, शेलेट स्पर।
परागण किस्में
गेल गाला, रेड लम गाला, फूजी, ग्रैनी स्मिथ।
पौधों को सहारा
M 9 मूलवृंत की जड़ें मिट्टी की ऊपरी सतह तक सीमित रहती हैं, जिससे पौधे स्वयं को सहारा नहीं दे पाते। फल लगने, वर्षा या तेज़ हवा के समय पौधों के उखड़ने की संभावना रहती है।
अतः M 9 के लिए सहारा प्रणाली (Staking / Trellis System) की सिफारिश की जाती है। इसमें प्रत्येक पौधे को अलग-अलग सहारा देना या पोल-तार संरचना तैयार करना शामिल है, जिसमें ओला अवरोधक जाल भी लगाए जा सकते हैं।
मध्यम वृद्धि वाले मूलवृंतों पर सहारा मुख्यतः पौधों की सीध बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है। जहाँ वायु प्रवाह कम हो और पौधे अच्छी तरह जमे हों, वहाँ सहारे की आवश्यकता कम होती है।
जैविक मल्चिंग
उच्च घनत्व बागों में जैविक मल्च के उपयोग की सिफारिश की जाती है। समय के साथ यह सड़कर मिट्टी की उर्वरता एवं जैविक तत्वों को बढ़ाता है।
सेब बाग लगाने में सावधानियाँ
उत्तराखंड का अधिकांश भाग भौगोलिक रूप से पूर्णतः शीतोष्ण (Temperate Zone) नहीं है। उत्तराखंड 28–31° उत्तरी अक्षांश, जबकि हिमाचल प्रदेश 30–33° उत्तरी अक्षांश पर स्थित है। हिमाचल प्रदेश में 1500 मीटर की ऊँचाई पर जितनी ठंड पड़ती है, उत्तराखंड में उतनी ही ठंड लगभग 2000 मीटर पर मिलती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण अब आवश्यक चिलिंग आवर्स पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
सुप्तावस्था एवं चिलिंग आवर्सः सर्दियों में तापमान गिरने एवं दिन छोटे होने पर पौधों में पत्तझड़ होता है तथा सैप का प्रवाह कम हो जाता है। इस अवधि में पौधे अपनी चयापचय क्रियाओं को धीमा कर ऊर्जा संचित करते हैं। सुप्तावस्था तोड़ने तथा अगले मौसम में अच्छी वृद्धि एवं पुष्पन- फलन के लिए चिलिंग आवर्स आवश्यक होते हैं।
चिलिंग आवर्स का अर्थ है— 0 से 7°C तापमान पर पौधों द्वारा बिताए गए घंटों की संख्या।चिलिंग आवर्स पूरे न होने पर पत्तियाँ एवं फूल देर से और लंबे समय तक आते हैं, जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सेब उत्पादन के लिए 2000 मीटर से अधिक ऊँचाई, उत्तर-पश्चिम ढाल, जंगलों के समीप क्षेत्र एवं अनुकूल माइक्रो-क्लाइमेट का चयन करें। दक्षिण एवं दक्षिण- पश्चिम ढाल पर सेब का बाग न लगाएँ।
पुराने सेब बागों में पुनः सेब रोपण (री-प्लांटेशन) से बचें। ऐसे स्थानों पर अखरोट या नाशपाती का रोपण अधिक उपयुक्त है।
मृदा परीक्षण अनिवार्य है। सेब के लिए मिट्टी का pH 5.8–6.8 तथा कार्बन स्तर 0.8 से कम नहीं होना चाहिए।
क्लोनल रूट स्टॉक में मूसला जड़ नहीं होती, अतः सिंचाई व्यवस्था सुनिश्चित करें।
एम-9 रूट स्टॉक पर उच्च घनत्व की खेती केवल उन्हीं बागवानों के लिए लाभदायक है जिनके पास मजबूत सहारा प्रणाली, ड्रिप सिंचाई, फर्टिगेशन व्यवस्था तथा तकनीकी ज्ञान उपलब्ध हो।
सेब मिशन के अंतर्गत बाग लगाने से पूर्व विशेषज्ञों एवं सफल बागवानों से परामर्श अवश्य लें, क्योंकि सेब की सघन बागवानी पूंजी एवं तकनीक पर अत्यधिक निर्भर है।
