डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 03 फरवरी, 2026ः उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में उद्यान विकास का इतिहास चौबटिया गार्डन से प्रारंभ होता है, जिसे वर्तमान में राजकीय उद्यान, चौबटिया के नाम से जाना जाता है। ‘चौबटिया’ का शाब्दिक अर्थ है—चार स्थानों को जाने वाले मार्गों का संगम। ये चार स्थान हैं: भड़गांव, रानीखेत, देहर्ती (Dehrti) एवं पिलखोली। चौबटिया गार्डन रानीखेत (जनपद अल्मोड़ा) से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस उद्यान का कुल क्षेत्रफल लगभग 235 हेक्टेयर है। इसकी स्थापना वर्ष 1860 में हुई, किंतु इसे विधिवत् उद्यान का स्वरूप वर्ष 1869 में प्राप्त हुआ। मि० क्रो (W. Crow) के नेतृत्व में यहाँ सेब, नाशपाती, खुबानी, प्लम, चेरी, हेज़लनट आदि शीतोष्ण फलों के पौधों का रोपण किया गया।
वर्ष 1914 में चौबटिया गार्डन को कुमाऊँ वन विभाग से हटाकर कुमाऊँ कमिश्नर के अधीन कर दिया गया। इसके अंतर्गत गवर्नमेंट हाउस गार्डन, कचहरी गार्डन, डिस्प्ले गार्डन (नैनीताल) तथा डगलस डेल हॉर्टिकल्चर गार्डन, ज्योलिकोट को भी सम्मिलित किया गया। नार्मन गिल को कुमाऊँ गवर्नमेंट गार्डन का सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया गया। नार्मन गिल ने फलों की बागवानी के साथ-साथ जड़ी-बूटियों की खेती पर भी कार्य प्रारंभ किया, जिसमें रामलाल साह ने एक प्रमुख सहयोगी की भूमिका निभाई। नार्मन गिल का कार्यकाल कुमाऊँ बागवानी का स्वर्णिम काल माना जाता है। वर्ष 1922 में ये सभी उद्यान, जिन्हें सामूहिक रूप से कुमाऊँ गवर्नमेंट गार्डन कहा जाता था, को कमिश्नर कुमाऊँ की देखरेख से हटाकर कृषि विभाग, लखनऊ के अधीन कर दिया गया।
ब्रिटिश शासन द्वारा वर्ष 1932 में पर्वतीय क्षेत्रों में शीतोष्ण फलों के उत्पादन से संबंधित वैज्ञानिक ज्ञान—जैसे पौधारोपण, पौध प्रवर्धन, मृदा प्रबंधन, खाद एवं सिंचाई, कटाई-छंटाई तथा कीट-रोग नियंत्रण—के विकास हेतु चौबटिया उद्यान में पर्वतीय फल शोध केंद्र (Hill Fruit Research Station) की स्थापना की गई। इस शोध केंद्र द्वारा न केवल उत्तराखंड, बल्कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, सिक्किम जैसे अन्य पर्वतीय राज्यों तथा पड़ोसी देशों भूटान, नेपाल एवं अफगानिस्तान को भी फल पौध रोपण सामग्री उपलब्ध कराई गई। साथ ही, इन राज्यों एवं देशों के प्रसार कार्यकर्ताओं को यहाँ नियमित रूप से प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाता रहा।
भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के समग्र विकास की परिकल्पना को साकार करने के उद्देश्य से वर्ष 1953 में माल रोड, रानीखेत (अल्मोड़ा) स्थित किराये के भवनों में फल उपयोग विभाग, उत्तर प्रदेश (निदेशालय) की स्थापना की। डॉ० विक्टर साने इसके प्रथम निदेशक नियुक्त किए गए। वर्ष 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उद्यान निदेशालय का भवन चौबटिया में बनाने का निर्णय लिया गया तथा वर्ष 1992 में उद्यान भवन, चौबटिया (रानीखेत) बनकर तैयार हुआ। इससे पूर्व, वर्ष 1990 में निदेशालय का नाम परिवर्तित कर “उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उत्तर प्रदेश” कर दिया गया।
चौबटिया गार्डन में संकलित सेब की कुछ प्रमुख किस्में
(1) शीघ्र पकने वाली किस्में-
अर्ली सनराइज, फैनी, बिनौनी, ग्रीन स्वीट, रेड जून, किंग ऑफ पिपिन, टाइडमैन अर्ली वर्सेस्टर, रेड स्टिकन, समर गोल्ड पिपिन।
(2) मध्यम पकने वाली किस्में-
रेड डिलीशस, स्ट्राकिंग डिलीशस, गोल्डन डिलीशस, रॉयल डिलीशस, रिच-ए-रेड, रेड गोल्ड, मैकन्टोश, टॉप रेड, विंटर बनाना।
(3) देर से पकने वाली किस्में-
राइमर, वॉशिंगटन, रोम ब्यूटी।
सेब की स्पर टाइप किस्में- आर्गन स्पर रैडचीफ ,स्टार स्पर रैड, समर रेड, स्टार क्रीमसन, रेडिस्पर,गोल्ड स्पर।
चौबटिया शोध केंद्र द्वारा विकसित प्रजातियां – चौबटिया प्रिन्सैज, चौबटिया अनुपम आदि प्रमुख हैं।
वर्तमान स्थिति –
राज्य गठन के समय यह आशा जगी थी कि नवगठित राज्य की सरकारें अपने पूर्वजों द्वारा रखी गई उद्यान विकास की इस मजबूत आधारशिला को आगे बढ़ाकर पर्वतीय बागवानों के हित में सुदृढ़ करेंगी। किंतु दुर्भाग्यवश आज यही आधारशिला बंद होने के कगार पर खड़ी दिखाई देती है। जबकि इस पर्वतीय राज्य का आर्थिक विकास मुख्यतः उद्यान विकास के माध्यम से ही संभव था, परंतु विडंबना यह है कि राज्य गठन के लगभग 25 वर्षों बाद भी उद्यान विभाग को स्थायी निदेशक नहीं मिल सका। इस अवधि में 15 से अधिक कार्यवाहक निदेशक अल्पकाल के लिए नियुक्त किए गए, जिनका अधिकांश समय सेवा विस्तार और प्रशासनिक संतुलन साधने में व्यतीत हो गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज अधिकांश आलू फार्म, औद्यानिक फार्म तथा फल शोध केंद्र या तो बंद हो चुके हैं अथवा बंद होने की कगार पर हैं।
एक समय था जब उद्यान विभाग फल पौध, सब्जी बीज एवं आलू बीज उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर था, बल्कि उच्च गुणवत्ता की सेब, आड़ू, प्लम, खुबानी एवं नाशपाती की पौध अन्य राज्यों को भी उपलब्ध कराता था।
चौबटिया गार्डन में वर्षों से देश-विदेश से संकलित सेब, नाशपाती, आड़ू, प्लम, खुबानी, चेरी आदि फलों की अनेक अमूल्य किस्मों के पौधों को काट दिया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण एवं चिंताजनक है।
वर्तमान में पुनः चौबटिया गार्डन में सेब, कीवी, नाशपाती, चेरी आदि फलों की किस्मों के संकलन एवं उत्पादन के साथ-साथ उद्यान को पुष्पों से सजाकर पर्यटन के आकर्षण केंद्र के रूप में विकसित करने की चर्चाएँ चल रही हैं। अब यह तो भविष्य ही बताएगा कि पर्वतीय क्षेत्रों में उद्यान विकास का गौरवशाली इतिहास रखने वाला चौबटिया गार्डन वास्तव में कितना पुनर्जीवित हो पाता है।
