मित्र कीट एवं शत्रु कीट की पहचान कैसे करें, डॉ. राजेंद्र कुकसाल से जानिए

क्या आप जानते हैं कि हर कीड़ा फसल का दुश्मन नहीं होता? 🐞🐝 कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारे 'मित्र कीट' खत्म हो रहे हैं, जिससे फसलों में बीमारियां और बढ़ रही हैं। डॉ. राजेंद्र कुकसाल से जानिए कैसे पहचानें फसलों के रक्षक (मित्र कीट) और भक्षक (शत्रु कीट) को।

Rajendra Kuksal
5 Min Read

डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 15 फरवरी, 2026ः फसलों को हानि पहुँचाने वाले कीटों की समस्याओं से निपटने के लिए सामान्यतः किसान केवल रसायनों का ही सहारा लेते हैं। कीटनाशक रसायन जहाँ एक ओर खर्चीले होते हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं तथा उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु आज जैविक/प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

जैविक एवं प्राकृतिक खेती में जैविक नियंत्रण साधनों का विशेष महत्व है। इसमें अनेक प्रकार के परजीवी (Parasites), परभक्षी (Predators), लाभकारी फफूँद, बैक्टीरिया, विषाणु तथा अन्य जीव-जन्तु शामिल हैं, जो फसलों के हानिकारक कीटों एवं रोगों का प्राकृतिक रूप से नियंत्रण करते हैं ।सामान्य पर्यावरण में ये सभी जीव अपना कार्य निरंतर करते रहते हैं और कीटों की संख्या को काफी हद तक सीमित बनाए रखते हैं।

परन्तु वर्तमान सघन एवं रासायनिक खेती प्रणाली में इन मित्र जीवों की कार्यशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसका मुख्य कारण रसायनों का अन्धाधुंध प्रयोग है।

एक ही कीटनाशक का बार-बार उपयोग करने से कीटों एवं रोगों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। परिणामस्वरूप निर्धारित मात्रा में दवा का प्रयोग करने पर भी कीट मरते नहीं हैं, बल्कि कुछ समय बाद उनकी संख्या और अधिक बढ़ जाती है। इस स्थिति को Resurgence (पुनरुत्थान) कहा जाता है।

प्रकृति में फसलों को हानि पहुँचाने वाले कीटों के साथ-साथ ऐसे कीट भी पाए जाते हैं, जो हानिकारक कीटों को नष्ट करते हैं। इन्हें किसानों के मित्र कीट या परभक्षी (Predators) कहा जाता है। रसायनों के अन्धाधुंध प्रयोग से ये मित्र कीट हानिकारक कीटों की अपेक्षा जल्दी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि ये प्रायः फसल की ऊपरी सतह पर शिकार की खोज में रहते हैं और सीधे रसायन के संपर्क में आ जाते हैं।

इस प्रकार मित्र कीट और शत्रु कीटों के बीच प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है तथा हानिकारक कीटों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। कई बार ऐसे कीट, जो पहले हानि पहुँचाने की क्षमता नहीं रखते थे, वे भी नुकसान पहुँचाने लगते हैं। इसे Secondary Pest Outbreak (द्वितीयक कीट प्रकोप) कहा जाता है।अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि किसान मित्र कीट एवं शत्रु कीट की सही पहचान करें।

मित्र कीट की पहचान

1 ये प्रायः मांसाहारी होते हैं।

2 ये बहुत तीव्र गति से भागते या उड़ते हैं।

3 ये फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों को खाकर या अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें नष्ट करते हैं तथा उनमें रोग उत्पन्न करके मार देते हैं।

4 इनका जीवन चक्र प्रायः छोटा होता है तथा इनकी सक्रियता अधिक होती है।

5 ये प्रायः चमकीले एवं भड़कीले रंग के होते हैं तथा स्वभाव से चंचल होते हैं।

6 इनकी आँखें बड़ी होती हैं तथा सिर के भाग पर उभरी हुई दिखाई देती हैं।

7 अधिकतर मित्र कीट डंक वाले होते हैं।

8 ये चींटी, ततैया एवं मक्खी के रूप में पाए जाते हैं।

9 ये भूमि तथा पौधों के ऊपरी भाग में अधिक पाए जाते हैं।

परभक्षी (Predators) 
परभक्षी ऐसे जीव होते हैं, जो अपने भोजन के रूप में अन्य कीटों का शिकार करते हैं। ये फसल-नाशी कीटों को खाकर उनकी संख्या को नियंत्रित करते हैं। मकड़ी, ड्रैगनफ्लाई, डैमसलफ्लाई, कोक्सिनेलिड बीटल (Lady Bird Beetle), प्रेइंग मेंटिस, क्राइसोपर्ला (Chrysoperla), सिरफिड मक्खी, इअरविग, ततैया, चींटियाँ, चिड़िया/पक्षी, छिपकली आदि मित्र कीटों की श्रेणी में आते हैं।

शत्रु कीट की पहचान

1 ये प्रायः शाकाहारी होते हैं।

2 इनकी गति सामान्यतः धीमी होती है।

3 ये फसलों को प्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाते हैं।

4 इनमें प्रजनन क्षमता अधिक होती है।

5 ये प्रायः मटमैले या भद्दे रंग के होते हैं।

6 इनकी आँखें छोटी होती हैं और सिर के भीतर छुपी हुई प्रतीत होती हैं।

7 सामान्यतः इनमें डंक नहीं होता।

8 ये प्रायः पतंगा (Moth) रूप में पाए जाते हैं।

9 ये फसल में पौधों के तना, पत्ती, जड़ एवं फलों के भीतर छिपे हुए मिलते हैं।

प्रमुख शत्रु कीटों में रस चूसक कीट (जैसे एफिड्स, सफेद मक्खी, थ्रिप्स तथा मिलीबग), सफेद ग्रब (जो जड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं), तना एवं फल छेदक कीट, पत्ती खाने वाले कीट (कटरपिलर/इल्लियाँ), टिड्डियाँ तथा दीमक आदि प्रमुख हैं।

प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने तथा मित्र कीटों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि रासायनिक कीटनाशकों का अनावश्यक एवं अन्धाधुंध प्रयोग न किया जाए। मित्र कीटों के संरक्षण से कीट नियंत्रण प्राकृतिक रूप से संभव होता है और फसल उत्पादन अधिक सुरक्षित तथा टिकाऊ बनता है।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *