कद्दू का लाल भृंग कीट (Red Pumpkin Beetle) की रोकथाम का खास तरीका बता रहे डॉ. कुकसाल

कद्दू, लौकी और खीरे की फसल को लाल भृंग (Red Pumpkin Beetle) से बचाने के उपाय। डॉ. राजेंद्र कुकसाल से जानें कीट की पहचान, जीवन चक्र और जैविक व रासायनिक नियंत्रण के तरीके।

Rajendra Kuksal
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डॉ. राजेंद्र कुकसाल, 23 मार्च, 2026ः कद्दू वर्गीय फसलों जैसे कद्दू, खीरा, तोरी और लौकी में लाल भृंग कीट (Red Pumpkin Beetle) एक प्रमुख हानिकारक कीट है। इस कीट के वयस्क (Adult) और ग्रब/लार्वा (Larvae) दोनों ही फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। करेला की फसल में इसका प्रकोप अपेक्षाकृत कम देखा जाता है।

किसी भी कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए उसके स्वभाव, पहचान, प्रकोप और जीवन चक्र की जानकारी होना आवश्यक है। तभी उसका प्रभावी नियंत्रण संभव है।

इस कीट की चार अवस्थाएँ होती हैंः
1वयस्क (Adult)
2 अंडा (Egg)
3 लार्वा / ग्रब (Larva / Grub)
4 प्यूपा (Pupa)

कीट की पहचान
कद्दू का लाल भृंग (बीटल) चमकीले नारंगी रंग का होता है। इसका आकार लगभग 7 मिमी लंबा और 4.5 मिमी चौड़ा होता है।

नुकसान के लक्षण
वयस्क कीट पौधों के बीज पत्रक, कोमल पत्तियों, फूलों तथा फलों को खाकर नुकसान पहुँचाते हैं। बीज अंकुरण के बाद बीज पत्रक से लेकर 4–5 पत्तियों की अवस्था तक इसका प्रकोप सबसे अधिक होता है। इस कीट का आक्रमण सामान्यतः मार्च से अक्टूबर तक देखा जाता है।

जीवन चक्र
मादा कीट पौधों की जड़ों के पास मिट्टी में लगभग एक इंच नीचे अंडे देती है। ये अंडे एक-एक करके या 9–10 के समूह में हो सकते हैं। 5 – 7 दिनों में अंडों से निकले लार्वा (ग्रब) हल्के पीले- सफेद रंग के होते हैं। ये मिट्टी के अंदर रहते हुए पौधों की जड़ों और भूमि-स्तर के तने को काटकर नुकसान पहुँचाते हैं। इससे पौधों में छेद बन जाते हैं और बाद में इन स्थानों पर फफूंद संक्रमण होने से पौधे सड़ने लगते हैं। ये ग्रब भूमि की सतह से लगे फलों को भी नुकसान पहुँचाते हैं।

इस कीट का जीवन चक्र लगभग 25–37 दिनों में पूरा हो जाता है और मार्च से अक्टूबर तक इसकी लगभग पाँच पीढ़ियाँ बन जाती हैं। नवंबर से फरवरी के बीच यह कीट सुसुप्त अवस्था (Dormant Stage) में मिट्टी या घास-फूस में छिपा रहता है।

कीट नियंत्रण
कीट नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य आर्थिक नुकसान को कम करना और फसल का उत्पादन एवं गुणवत्ता बढ़ाना होता है।

1. संक्रमित पौधों को हटानाः यदि बीज अंकुरण के बाद बीज पत्रक या शुरुआती पत्तियाँ बहुत अधिक क्षतिग्रस्त हों, तो ऐसे पौधों को उखाड़कर पॉलीथीन में इकट्ठा कर नष्ट कर दें और उनकी जगह पुनः बीज बो दें।

 

2. हाथ से कीट संग्रहः सुबह के समय कीटों की सक्रियता कम रहती है। इसलिए पौधों पर लगे कीटों को हाथ से पकड़कर इकट्ठा कर नष्ट किया जा सकता है।

3. लकड़ी की राख का प्रयोगः लगभग 1 किलोग्राम लकड़ी की राख को कीटग्रस्त एक नाली फसल में बुरकें। राख छिड़कने के लिए उसे मारकीन या धोती के कपड़े में पोटली बनाकर रखें। एक हाथ से पोटली पकड़ें और दूसरे हाथ से डंडे से हल्का प्रहार करें ताकि राख पौधों पर समान रूप से गिरती रहे।

4. लार्वा नियंत्रणः पौधों की जड़ों के पास निराई-गुड़ाई करके मिट्टी को ढीला करें और मिट्टी तेल मिली लकड़ी की राख का बुरकाव करें, जिससे मिट्टी में मौजूद लार्वा नष्ट हो जाएँ।

5. नीम ऑयल का छिड़कावः नीम ऑयल (3000 पीपीएम) की 5 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर सुबह के समय कीटग्रस्त पौधों पर समान रूप से छिड़काव करें।

रासायनिक नियंत्रण
मैलाथियान या इमिडाक्लोप्रिड कीटनाशक का उपयोग किया जा सकता है। 2 मिली दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाएं (लगभग 1 चम्मच दवा 3 लीटर पानी में) सुबह के समय पौधों पर छिड़काव करें। 3 दिन के अंतराल पर 3 छिड़काव करें ,एक ही दवा का बार-बार उपयोग न करें।छिड़काव के घोल में 20 ग्राम देशी गुड़ प्रति लीटर पानी की दर से मिलाना लाभकारी होता है। छिड़काव के समय कीट उड़ जाते हैं और दवा के संपर्क में कम आते हैं, लेकिन गुड़ मिले घोल को मीठे के कारण पीने पर कीट नष्ट हो जाते हैं।

ग्रब/लार्वा नियंत्रण के लिए दवा के घोल से पौधों के आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह भिगो दें।

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