शीतकालीन फलों की पौध रोपने की विधि और किस्मों का चयन कैसे करें विस्तार से जानिए

Rajendra Kuksal
10 Min Read

डॉ. राजेंद्र कुकसाल, देहरादून, 25 जनवरी, 2026ः  फल पौध का चयन सदैव क्षेत्र की जलवायु एवं समुद्र तल से ऊँचाई के अनुसार करना चाहिए। 1200– 1700 मीटर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आड़ू, प्लम एवं खुबानी का रोपण उपयुक्त रहता है। 1700 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आड़ू, प्लम, खुबानी, नाशपाती, अखरोट एवं सेब के पौधे लगाए जा सकते हैं।

भूमि का चयन एवं मृदा परीक्षण

फलदार पौधे पथरीली भूमि को छोड़कर अधिकांश प्रकार की भूमि में उगाए जा सकते हैं, परंतु जीवांशयुक्त बलुई दोमट भूमि, जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो, सर्वोत्तम मानी जाती है। जिस भूमि में उद्यान स्थापित करना हो, उसका मृदा परीक्षण अनिवार्य रूप से कराना चाहिए। मृदा परीक्षण से मिट्टी में कार्बन की मात्रा, pH मान (पावर ऑफ हाइड्रोजन) तथा उपलब्ध पोषक तत्वों की जानकारी प्राप्त होती है।

pH मान मिट्टी की अम्लीयता एवं क्षारीयता का सूचक है, जो पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करता है। यदि pH मान कम होता है, तो पौधों में कैल्शियम, फास्फोरस एवं मैग्नीशियम की कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। pH मान मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों तथा मृदा स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है।
यदि मिट्टी का pH मान कम (अम्लीय) हो, तो मिट्टी में चूना मिलाएँ। यदि मिट्टी का pH मान अधिक (क्षारीय) हो, तो मिट्टी में कैल्शियम सल्फेट (जिप्सम) मिलाएँ।

मिट्टी के अधिक अम्लीय या क्षारीय होने से लाभदायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है, जबकि हानिकारक जीवाणुओं एवं फफूँद (फंगस) की वृद्धि बढ़ जाती है। साथ ही मृदा में उपस्थित सूक्ष्म एवं मुख्य पोषक तत्वों की घुलनशीलता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिकांश फल पौधों के लिए 5.5–7.5 pH मान उपयुक्त रहता है। पहाड़ी क्षेत्रों में प्रायः मृदा अम्लीय पाई जाती है, अतः भूमि में प्रत्येक दो वर्ष में 100 ग्राम बारीक पिसा चूना प्रति वर्गमीटर की दर से अवश्य मिलाएँ।

अच्छी उपज के लिए मिट्टी में जैविक/जीवांश कार्बन की मात्रा 0.8% तक होनी चाहिए। जैविक कार्बन कृषि के लिए अत्यंत लाभकारी होता है, क्योंकि यह भूमि को संतुलित बनाए रखता है तथा मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक गुणवत्ता में सुधार करता है। जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने के लिए जंगलों में पेड़ों के नीचे की ऊपरी सतह की मिट्टी, सड़ी गोबर खाद, कम्पोस्ट अथवा जीवामृत का प्रयोग करें।

किस्मों का चयन

फल पौधों की किस्मों का चयन स्थान विशेष की ऊँचाई, पहाड़ी ढाल एवं बाजार की मांग के अनुसार करना चाहिए।

आड़ू की किस्में
घाटी वाले क्षेत्रों के लिए शान- ए- पंजाब, सहारनपुर प्रभात, फ्लोरिडासन प्रभात, सनरेड एवं सरवती। इन किस्मों से अप्रैल के अंतिम सप्ताह से मई–जून तक फल प्राप्त होते हैं।

मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए  FLA – 1633 (भारत– इटली फल विकास योजना), रेड जून, पैरा डीलक्स, जुलाई एल्बर्टा एवं अषाढ़ी। रेड जून किस्म के फल मई के अंत तक बाजार में आ जाते हैं, जिनकी मांग अधिक रहती है। पैरा डीलक्स पछेती किस्म है, जिसके फल आकार में रेड जून से बड़े होते हैं।

अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए अलेक्जेंडर, अर्ली एल्बर्टा, जुलाई एल्बर्टा तथा पछेती किस्म पैरीग्रीन अच्छा उत्पादन देती हैं।

खुबानी की किस्में
मध्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए  न्यूकैसल, कैशा, अर्ली सिप्ले, शकरपारा प्रमुख उन्नत किस्में हैं।
अगेती किस्में  कैशा, अर्ली सिप्ले, न्यू लार्ज अर्ली, चारमग्ज, चौबटिया मधु एवं चौबटिया केसरी।
पछेती किस्में  टर्की, मोरपार्क, कैशा, रॉयल, सेंट एम्ब्रोज।
रेड बुलेरो एवं रुबिल खुबानी की नवीन किस्में हैं।

प्लम की किस्में  रेड ब्यूट, ब्लैक एंबर, मैथली, ग्रीन गेज, फ्रायर, हिरोमी रेड प्लम, क्रिमसन ग्लो, फॉर्च्यून, गोल्डन प्लम, मैरीपोजा, स्टेनले पर्पल, ब्लैक स्प्लेंडर, सैंटा रोजा आदि प्रमुख किस्में हैं। रेड ब्यूट एक अगेती किस्म है, जबकि ब्लैक एंबर अपेक्षाकृत देर से तैयार होने वाली किस्म है।

प्लम की नई किस्मों जैसे ब्लैक एंबर, फॉर्च्यून और फ्रायर—की शेल्फ लाइफ अधिक होती है। रेड ब्यूट प्लम की शेल्फ लाइफ लगभग 5 दिन होती है, जबकि ब्लैक एंबर की शेल्फ लाइफ 20 दिन से अधिक होती है। इन किस्मों को कोल्ड स्टोरेज में लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे दूर-दराज के क्षेत्रों से भी इन्हें आसानी से बाजार तक पहुँचाया जा सकता है। ब्लैक एंबर के लगभग 15 दिन बाद फ्रायर किस्म तैयार होती है, जो काले रंग का बड़ा फल देती है। ये किस्में सामान्यतः रोपण के तीन वर्ष बाद फलों के नमूने देने लगती हैं।

प्लम की विभिन्न किस्मों का क्रमबद्ध रोपण करने से बागवान तीन से चार माह तक लगातार चरणबद्ध उपज प्राप्त कर सकते हैं।

नाशपाती की किस्में रेड वार्टलेट, मैक्स रेड, वार्टलेट, विंटर नेलिस।

अखरोट 
अखरोट में यथासंभव कलमी पौधों का चयन करें। विभागों अथवा परियोजनाओं के अंतर्गत वितरित बीजू पौधों की विश्वसनीयता सामान्यतः कम पाई जाती है।

पौध सामग्री के चयन में सावधानियाँ
सरकारी योजनाओं एवं परियोजनाओं में आड़ू व प्लम के पौधे प्रायः सहारनपुर एवं अन्य मैदानी क्षेत्रों की पंजीकृत पौधशालाओं से क्रय किए जाते हैं। मैदानी क्षेत्रों में पौधे एक ही वर्ष में तैयार हो जाते हैं, जिससे उनकी उत्पादन लागत कम होती है। किंतु पहाड़ी क्षेत्रों में इनके रोपण के बाद मृत्यु दर अधिक पाई जाती है। साथ ही ये प्रायः लो-चिलिंग किस्में होती हैं, जिनके फलों की बाजार में अपेक्षाकृत कम मांग रहती है। अतः सहारनपुर एवं अन्य मैदानी क्षेत्रों की पौधशालाओं में तैयार किए गए शीतकालीन फल पौधों को पहाड़ी क्षेत्रों में कदापि न लगाएँ। शीतकालीन फल पौधे सदैव पहाड़ी क्षेत्रों की पंजीकृत पौधशालाओं से ही क्रय करें।

सेब की सघन बागवानी 
उत्तराखंड सरकार द्वारा सेब मिशन के अंतर्गत सेब की अति सघन बागवानी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें पारंपरिक सीडलिंग रूट स्टॉक के स्थान पर क्लोनल रूट स्टॉक (जैसे M-9, M-26, MM-106 आदि) का उपयोग कर कम दूरी पर अधिक पौधे लगाए जाते हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र 8–10 गुना तक अधिक उत्पादन संभव होता है। इस प्रणाली में बौनी एवं अर्ध-बौनी किस्में शीघ्र फलन देती हैं, प्रबंधन एवं तुड़ाई सरल होती है तथा बाजार- अनुकूल समान आकार एवं रंग के फल प्राप्त होते हैं।
हालाँकि, इस पद्धति की सफलता के लिए उपयुक्त ऊँचाई एवंमाइक्रो- क्लाइमेट, सही किस्म–रूट स्टॉक , मजबूत सहारा प्रणाली, ड्रिप सिंचाई व फर्टिगेशन, मृदा परीक्षण, पर्याप्त चिलिंग आवर्स तथा तकनीकी ज्ञान अनिवार्य है। विशेष रूप से M-9 जैसे रूट स्टॉक पर उच्च घनत्व की खेती उन्हीं बागवानों के लिए लाभकारी है, जिनके पास सिंचाई, सहारा एवं उन्नत प्रबंधन की समुचित व्यवस्था हो।

बाग स्थापना की तैयारी 
बाग लगाने से एक माह पूर्व खेत की सफाई करें तथा बाग का रेखांकन (ले-आउट) कर गड्ढे खोद लें। गड्ढों को कुछ समय के लिए खुला छोड़ दें, जिससे सूर्य का प्रकाश भीतर तक पहुँच सके। जल निकासी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करें।

रोपण दूरी
आड़ू / प्लम / खुबानी   6 × 6 मीटर
नाशपाती  8 × 8 मीटर
अखरोट  10 × 8 मीटर।

रोपण हेतु 1 × 1 × 1 मीटर आकार के गड्ढे खोदें।

पौधों का रोपण दिसम्बर–जनवरी माह में करें। बाग में कम से कम 10% परागणकर्ता किस्मों का रोपण अवश्य करें।

पौध रोपण विधि 
यदि पौधे दूर से लाए गए हों, तो रोपण से पूर्व ट्रेंचिंग (नाली में नम मिट्टी में अस्थायी दबाना) करें, जिससे पौधों में जल संचार संतुलित हो सके।

पूर्व में खोदे गए गड्ढों में मिट्टी के साथ अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद मिलाकर भूमि की सतह से लगभग 2 इंच ऊपर तक भरें। पौधे को गड्ढे के मध्य में उसी गहराई पर लगाएँ, जितनी गहराई में वह नर्सरी में लगा था। ध्यान रखें कि ग्राफ्ट यूनियन भूमि से ऊपर रहे तथा रोपण से पूर्व पौधे को ग्राफ्ट से 45–50 सेमी ऊपर से अवश्य काट लें।
केवल स्वस्थ एवं पूर्ण विकसित जड़ों वाले पौधों का ही रोपण करें। रोपण के समय माइकोराइजा, ह्यूमिक एसिड एवं बायोचार का प्रयोग मिट्टी की सेहत एवं पौधों की वृद्धि दर बढ़ाने में सहायक होता है।

माइकोराइजा को जड़ों के पास छिड़कें तथा ह्यूमिक एसिड एवं बायोचार को ऊपरी मिट्टी (टॉप सॉइल) में मिलाएँ।

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *